फार्मेसी का दूसरा नाम है अनार

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समाचार सच, स्वास्थ्य डेस्क। दृष्टि एवं तार्किकता की बुनियाद पर इस विचार को देखें तो पाते हैं कि आपके घर में अनार का वृक्ष होने का मतलब यह है कि आपके घर में एक पूरी फार्मेसी है। इसके फल (दानों) के चाहने वाले इसके फल के छिलके को फेंक देते हैं जो गुणों की खान होता है। फल के छिलके एवं फल (दानों) के अलावा तने का छिलका, पत्तियां, फूल एवं जड़ तथा बीज व बीज के तेल का भी इस्तेमाल होता है। देसी चिकित्सा पद्धति में अनार खस महत्व रखता है। ताजे अनार के रस से भूख बढ़ती है, खाना पचता है और रक्त के संघटन में वृद्धि एवं सुधार होता है। लौंग एवं इलायची के मिला देने पर तो क्षुधावर्धन एवं पाचन के इसके गुणों को चार चांद लग जाते हैं। इस तरह से लें या फिर सीधे तरीके से अनार का फल या उसका रस बढ़े हुए पित्त से होने वाले दाह (शरीर में गर्मी महसूस होने) को कम करता है।
मीठा अनार – यदि फल दानों को जाए तो यह त्रिदोषहर, तृप्दिाय, वीर्यवर्धक, हल्का, कसैला अनु रस (जो बाद में महसूस होता है) ग्राही, स्निग्ध, मेधा-बुद्धिवर्धक और मुख की दुर्गंध को नष्ट करता है।
खट्टा-मीठा अनार – यह अग्नि (पाचकाग्नि या भूख) को बढ़ाता है। रूचि पैदा करता है, कुछ-कुछ पित्त को बढ़ाता है परंतु पचन में हल्का होता है।
खट्टा अनार – यह स्वाद में खट्टा होता है, वात-कफ को नष्ट करता है परंतु पित्त को बढ़ाता है। इसलिए पित्त प्रकृति वालों, पित्तज रेागों में एवं गर्मी के दिनों में खट्टे अनार का भूलकर भी सेवन नहीं करना चाहिए।
मीठा अनार दरअसल, मेवे की तरह होता है। वैसे तो इससे होने वाली पुष्टि अत्यल्प होती है तथापित वह उत्तम रक्त पैदा करती है। यानी रक्तगत लौह (हीमोग्लोबीन) एवं श्वेत रक्तकण को बढ़ता है। शीत एवं तर होने के नाते यह गर्मियों के दिनों में और गर्म मिजाज वालों को खासकर फायदा देता है। अनार का रस एक प्रकार लघु पथ्याहार है। एक बार में 25 से 60 मिली तक प्रयोग किया जा सकता है। खट्टा अनार दूसरे दर्जे में श् ाीत एवं रूक्ष होता है। यह भूख लगाता है, रक्त एवं पित्त के प्रकोप का संशमन करता है। यह यकृत एवं हृदय को बल देता है और ग्राही होता है। इसके शर्बत का उपयोग दस्तों को बंद करने तथा आमाशय की उष्णता को कम करने हेतु करते हैं जबकि खट्टा-मीठा अनार समप्रकृति के समीप शीत एवं तर होता है। यह पित्त प्रकृति वालों के लिए गुणकारी है।
अनाज का छिलका – यह शीत तथा रूक्ष होता है। इसका उपयोग रूक्षण, ग्राही, उष्ण कंठ के शोध को कम करने वाला तथा रक्तस्तम्भन करता है। दांत हिलने एवं मुख में छाले होन ेपर इसका गंडूण, मंजन एवं अवचूर्णन की भांति प्रयोग करते हैं। यदि किसी स्त्री को अधिक रक्तस्राव हो रहा हो या किसी को खूनी बवासीर हो तो छिलके काढ़े से उसे कटिस्नान करवाने पर लाभ होता है।
मूल त्वक – इसके गुण एवं प्रकृति वृक्ष (तने) की छाल जैसे ही होत हैं परन्तु यह अधिक वीर्यवान होती है। यह भी शीत प्रकृति वालों को हानिकर होती है। इसकी मात्रा 5 से 7 ग्राम हितकर होती है।
अनारदाना – यह पहले दर्जे में शीत एवं रूक्ष होता है। यह दीपन, पाचन, ग्राही, रोचक, क्षुधाजनक, पित्त संशमन होता है। अनारदानों को चटनी में डालकर प्रयोग करते हैं। यह भी पित्त प्रकृतिवालों हेतु अहितकर होता है। इस हेतु जीरे का प्रयोग करते हैं। यदि खट्टे अनारदाने (खासकर पहाड़ी अनार का दाना) के साथ बराबर मात्रा में मुनक्का तथा काला जीरा पीसकर चटनी बनाकर खायें तो वह विशेषतः दीपन-पाचन होता है। अनारदाने को पुदीने की चटनी में डालते हैं।

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