समाचार सच, नैनीताल। भारत सरकार ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में कहा है कि वानिकी अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ) देहरादून, मान्यता प्राप्त संस्थान अथवा विश्वविद्यालय नहीं है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय (डीओपीटी) ने यह हलफनामा चर्चित आइएफएस संजीव चतुर्वेदी के डिग्री विवाद से जुड़े एक मामले में दिया है। मामले में भारत सरकार ने केंद्रीय कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) सदस्य पद के लिए आइएफएस संजीव का आवेदन खारिज कर दिया था। जिसे संजीव ने याचिका दायर कर हाई कोर्ट में चुनौती दी। इस मामले में विवाद के प्रमुख बिंदुओं में से एक यह है कि एसएससी सदस्य पद के लिए निर्धारित योग्यता परास्नातक डिग्री मांगी गई थी। संजीव ने 1998 में जारी एफआरआइ के उस नोटिफिकेशन को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया था, जिसमें एफआरआइ ने भारतीय वन सेवा के प्रशिक्षण कोर्स को एमएससी वानिकी माना जाता है। संजीव के अधिवक्ता सुदर्शन गोयल के मुताबिक 28 अप्रैल को दिए हलफनामे में डीओपीटी ने लिखा है कि संजीव की परास्नातक डिग्री किसी मान्यता प्राप्त विवि या संस्थान से जारी नहीं है। इस मामले में हाई कोर्ट ने 22 अप्रैल को भारत सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का अंतिम मौका दिया था।
एफआरआइ उत्तराखंड में सबसे पुराने संस्थानों में रहा है। वानिकी के क्षेत्र में किए जाने वाले अनुसंधानों के लिए पूरे देश के साथ साथ विश्व में भी इसकी पहचान है। इस संस्थान की स्थापना 1878 में ब्रिटिशकाल में की गई थी। 1991 में एफआरआइ को यूजीसी द्वारा डीम्ड विवि घोषित किया गया था। 1998 में एफआरआइ की एकेडेमिक काउंसिल ने सर्वसम्मति से आदेश पारित किया कि इंदिरा गांधी राष्टड्ढ्रीय वन अकादमी में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों के प्रशिक्षण कोर्स को एमएससी वानिकी की डिग्री के रूप में घोषित किया जाता है।
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