समाचार सच, हल्द्वानी डेस्क। देश आजाद होने के बाद से ही हमारे देश में किसानों के नाम पर जो सियासत का दौर चला वह आज भी जारी है। आज जो भी सियासी दल इस मामले में राजनीति कर रहे हैं वे किसानों के मसीहा कम अपनी राजनीति को चमकाने में लगे है। अगर सियासी दल अपने इस मामले में सियासत नहीं करते तो आज तक अन्नदाताओं की हालात ये नहीं होती।
ज्ञात हो कि वर्तमान में किसान कानूनों को लेकर किसान तो आंदोलन हैं लेकिन उनके नाम पर वर्तमान में जिस प्रकार से सियासत का दौर जारी है वह अन्नदाता के नाम से मजाग ही कहा जायेगा। यह तो जगजाहिर है कि किसान पिछले सत्तर सालों से अपने हकों की लड़ाई लड़ रहा है लेकिन ईमानदारी से उसकी सुध लेने वाला कोई नजर नहीं आ रहा है।
हालांकि वर्तमान मंे सरकार ने जो कानून बनाया है वह किसानों के लिए कितना खरा उतरता है यह एक बहस का मुद्दा हो सकता है। इस पर देश के सियासी दल अपनी रोटियां सेंकने में व्यस्त है। जहां कुछ दल इससे किसानों के समर्थन में मान रहे हैं वहीं कुछ दल इसे किसानों के खिलाफ बताकर इसका विरोध कर रहे हैं। हालाकि कौन कितना सही है यह तो बिल को देखकर पता चलेगा लेकिन किसानों की समस्यसाओं पर ईमानदारी से कार्य करने का वक्त आ गया है। अभी तक किसानों को सियासती वोट बैंक का ही हिस्सा माना जा रहा है लेकिन किसान
कब तक चुप रहेंगे। सरकार लाख प्रयास भी कर ले लेकिन किसानों की दुर्दशा आज भी जारी है। मंडी में ही जाकर इसका पता चलता है कि अन्नदाता के क्या हाल हैं। जब दुकानदार दस रूपये में पांच गड्डी सब्जी बेच रहा है तो इससे यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इसके लिए किसान को क्या बचा होगा। जाहिर है कि कहीं न कहीं इस मामले में गड़बढ़ है।


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