समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। वैदिक ज्योतिष में जन्मकुंडली के तीसरे भाव को सहज भाव या पराक्रम भाव भी कहा जाता है। इस भाव से किसी भी जातक के छोटे भाई बन, नौकर चाकर, धैर्य, साहस, बल कंधे और हाथ आदि का विचार किया जाता है। जानिए राहु के तीसरे भाव में होने के फल।
- कुंडली के तीसरे भाव में स्थित राहु को अरिष्टनाशक और दुखों का नाश करने वाला बताया गया है। वैदिक ज्योतिष में जाता है कि इस भाव में स्थित राहु जातक को निरोगी काया और बल प्रदान करते हैं। ऐसे जातक अत्याधिक बलशाली होने के साथ साथ पराक्रमी और साहसी होते हैं।
- तृतीय भाव में राहु जातक को चंचल स्वभाव तो प्रदान करते हैं लेकिन साथ साथ जातक विद्यवान और भाग्यशाली होता है। ऐसे जातक अपने जीवन काल में कई प्रकार की यात्राएं करता है जिससे उसे खुश मान सम्मान और यश की प्राप्ति होती है।
- तीसरे भाव में राहु होने पर जातक की कीर्ति देश विदेशों मे फैलती है और वह अपने जीवन काल में खूब मान सम्मान प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति को दान पुण्य पर बहुत विश्वास होता है और वह सबके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करते हैं। ऐसे जातक किसी के साथ भी भेदभाव पूर्ण व्यवहार नहीं करते और जो भी कार्य करते हैं पूरी निष्ठा और लगन के साथ करते हैं।
- तृतीय भाव में स्थित राहु व्यक्ति को सभी प्रकार के सुख साधन, नौकर चाकर और वाहन इत्यादि सभी प्रकार विलासिता प्रदान करता है। व्यक्ति को बिना बहुत से प्रयत्न के जीवन में सबकुछ आराम से प्राप्त हो जाता है। तीसरे भाव में राहु व्यक्ति के भाग्योदय में सहायक होते हैं और व्यक्ति को जीवन में हर प्रकार की सफलता और वैभव प्रदान करते हैं।
- इस भाव में स्थित राहु के अशुभ होने पर जातक कई बार अभिमानी या अत्याधिक आलसी भी हो जाता है। ऐसे जातक अपने आस पास के लोगों पर शक करने लगता है और अपनी रातों की नींद खराब करता है। तृतीय भाव में खराब राहु कई बार भाइयों के बीच में बेमतलब का विरोध भी पैदा करता है और उनमें जीवनभर किसी न किसी बात को लेकर मनमुटाव बना रहता है।
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