पार्किंसंस का खतरा

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समाचार सच. स्वास्थ्य डेस्क। पार्किंसंस दिमाग से जुड़ी बीमारी है, जिसमें न्यूरॉन कोशिकाएं मृत होने लगती है। न्यूरॉन केमिकल मैसंजर उत्पादित करता है जिसे डोपामाइन कहते है। जब डोपामाइन का स्तर गिरने लगता है तो दिमाग असामान्य गतिविधियां करने लगता है जिससे पार्किंसंस बीमारी के लक्षण उभरने लगते है। अगर साधारण शब्दों में कहें तो इस बीमारी में दिमागी कोशिकाएं बनना बंद हो जाती है। शुरूआती सालों में इसके लक्षण काफी धीमे होते है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते है।
विशेषज्ञों के अनुसार हृदय रोग और कैंसर की तरह इस बीमारी को ज्यादा तवज्जों नहीं दी जाती लेकिन बीमारी बढ़ने पर ये रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करने लगती है। दुनियाभर में 6.3 मिलियन लोग इस बीमारी से पीड़ित है। हांलाकि ये बीमारी आमतौर पर 60 साल के बाद होती है, लेकिन दस में से एक व्यक्ति को ये 50 साल की उम्र से पहले हो जाती है और इस बीमारी से महिलाओं के मुकाबले पुरूष ज्यादा प्रभावित होते हैं।
कारण – पार्किंसंस बीमारी के सही कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है लेकिन जेनेटिक कारको, पर्यावरणीय कारको, उम्र बढ़ने, अस्वस्थ जीवनशैली और तनाव इत्यादि को इसमें शामिल किया गया है। महिलाओं में इस बीमारी के कम होने कारण एस्ट्रोजन हार्मोन का बनना है।
कई बीमारियां जैसी कि दिल संबंधी बीमारियां, ऑस्टियोपोरिसस महिलाओं व पुरूषों में अलग-अलग अनुपातों में पाया जाता है। वैज्ञानिक तौर पर ये साबित है कि महिलाओं और पुरूषों में अलग – अलग शारीरिक संरचना होती है जिसकी वजह से बीमारियों को दोनों में अलग – अलग अनुपात होता है। हांलाकि पार्किंसंस की बीमारी भी इसी श्रेणी में आती है किंतु इसका साफ तौर पर कोई स्पष्टीकरण नहीं है।
कीटनाशकों के संपर्क से बढ़ रहा है खतरा
अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी न े 2013 में कीटनाशकों के संपर्क में लगातार आने से पार्किंसंस बीमारी होने का कारण बताया। गौरतलब है, कि पिछले कुछ समय से पार्किंसंस बीमारी के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। लंबे समय तक कीटनाशकों के संपर्क से बीमारी होने का खतरा है, तो लोगों को ये समझना बहुत जरूरी है कि फल व सब्जियांे को खाने या बनाने से पहले अच्छे से धोना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा आर्गेनिक फल सब्जियांे आदि का चुनाव करके इस बीमारी के खतरे को कम किया जा ससकता है।
डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन सर्जरी
लोग अक्सर पार्किंसंस के होने पर शर्मिंदगी महसूस करते है। इसी करण दवाइयों का सहारा लेते है लेकिन दवाइयों के साइड इफेक्ट्स बहुत ज्यादा होते है और दवाइंया अस्थाई इलाज है क्योंकि एक समय पर आकर दवाइयां काम करना बंद कर देती है। इसके रोगी के लिए डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन सर्जरी (डीबीएस) ही एकमात्र विकल्प बचता है।
डीबीएस थैरेपी का प्रभाव
इस थैरेपी से पार्किंसंस बीमारी के लक्षणों कंपकंपाहट, अकड़न और चलने में दिक्कत जैसी परेशानियों का इलाज किया जा सकता है। डीबीएस थैरेपी में एक छोटा सा पेसमेकर जैसा उपकरण इस्तेमाल किया जाता है जो दिमाग के उन हिस्सों को तरंगित करता है जो पार्किंसंस के लक्षणों की गतिविधियों से जुड़े होते है। ये तरंगे उन सभी दिमागी कोशिकाओं के मैसेज को बंद कर देते है जो लक्षणों को उत्पन्न करते हैं। इस उपकरण को छाती की त्वचा के अंदर लगा दिया जाता है और बहुत ही पतले तार के साथ जोड़ा जाता है, जो दिमाग के असामान्य सिग्नल्स को ब्लाक कर देते है जो कि पार्किंसंस बीमारी के लक्षणों का कारण है।

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