25 वर्ष पहले उत्तराखण्ड राज्य बनने की खुशियों की गूंज आज भी लोगों की स्मृतियों में ताज़ी है। राज्य गठन के उस सुनहरे क्षण ने पूरे पहाड़ को उत्साह से भर दिया था। इसी भावुक माहौल में जनकवि स्वर्गीय हीरा सिंह राणा जी ने जोशीले स्वर में गीत लिखा— “उत्तराखण्ड राज हैगो, गीत गहाओ, फुको हो रणसिंघ…”। वहीं जनकवि आनन्द बल्लभ पपनैं जी ने उम्मीदों से भरा गीत रचा— “उत्तराखण्ड राज छा, के बातै की कमती रौली…”।
लेकिन दो दशक बाद तस्वीर उलट चुकी है। विकास के सपनों के बीच पहाड़ आज पलायन की सबसे भयावह मार झेल रहा है। सैकड़ों गांव सूने पड़ चुके हैं, कई घर खण्डहर हो चुके हैं और जंगली जानवरों ने वीरान मकानों में बसेरा बना लिया है। जहां कभी पूजा-अर्चना की जाती थी, वे देवस्थल भी जीर्ण अवस्था में परिवर्तित हो रहे हैं। खेत बंजर और लोक-संस्कृति विलुप्ति के कगार पर है।
इन्हीं दर्दनाक सच्चाइयों को आवाज़ दी है श्री आनन्द बल्लभ पपनैं जी द्वारा रचित मार्मिक गीत “म्यर पहाड़–ढकी द्वार” ने। यह गीत केवल पलायन की कहानी नहीं, बल्कि पहाड़ की मौन पुकार है। गीत में गायक नवीन पाठक और दिलीप कुमार की आवाज़ भावनाओं को और गहराई देती है।
गीत के अंत में रचनाकार सरकार से पहाड़ में रोजगार के अवसर बढ़ाने की मांग करते हैं, ताकि मजबूरी का पलायन थमे और लोग फिर अपने गांव लौट सकें। पपनैं जी का मानना है कि लोगों का शारीरिक पलायन जरूर हुआ है, पर मानसिक रूप से हर पहाड़ी आज भी अपने गांव से ही जुड़ा है।
पपनैं जी की यह रचना उनके दशकों से चलते आ रहे साहित्यिक और सामाजिक योगदान की एक और सशक्त कड़ी है। उनकी कई प्रतिष्ठित रचनाएँ— बिखिलि शराब, चकबकान मन, आपण हाल-आपणि बात, पेड़ की पुकार, आदि— पहले ही आकाशवाणी से प्रसारित होकर लोकप्रिय हो चुकी हैं।
नव जारी गीत उत्तरांचल सीरीज़ यूट्यूब चैनल से प्रसारित हो चुका है और अपने मार्मिक संदेश तथा कर्णप्रिय प्रस्तुति के कारण श्रोताओं की सराहना पा रहा है।



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