“हाय लगना” या “बददुआ लगना” का मतलब होता है किसी व्यक्ति की दुखभरी भावना या नाराज़ी का असर दूसरे व्यक्ति पर पड़ना। जब कोई किसी से बहुत दुखी या आहत होता है और मन से कह देता है “भगवान करे इसे भी ऐसा ही दुख मिले” तो उसे आम बोलचाल में हाय या बददुआ कहा जाता है।
क्या सच में लगती है किसी की हाय या बददुआ?
यह विषय विज्ञान से ज्यादा आस्था और अनुभव पर आधारित है।
लोगों के अनुभव बताते हैं कि
जब कोई निर्दाेष व्यक्ति पर अत्याचार करता है, या
बुजुर्ग, माता-पिता, गरीब या पीड़ित व्यक्ति का दिल दुखाता है,
तो अक्सर कहा जाता है कि उसकी “हाय लग जाती है” यानी आगे चलकर जीवन में कष्ट या बाधाएँ आने लगती हैं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो
- ऐसा व्यक्ति खुद के कर्मों के नतीजे भुगतता है।
- नकारात्मक ऊर्जा और अपराधबोध भी उसके जीवन में परेशानी के रूप में लौट आते हैं।
- इसलिए धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से हाय लगना = बुरे कर्मों का फल माना जाता है।
कब लगती है किसी की बद्दुआ या हाय?
- लोगों के अनुसार “हाय” तब लगती है जब
- किसी निर्दाेष को धोखा या नुकसान पहुँचाया जाए।
- माता-पिता, बुजुर्ग या गरीब का अपमान किया जाए।
- किसी का दिल जानबूझकर दुखाया जाए।
- किसी की मेहनत या अधिकार छीन लिया जाए।
- बिना गलती के किसी को कष्ट दिया जाए।
कैसे बचें किसी की हाय या बद्दुआ से?
कुछ आसान उपाय माने जाते हैं
सच्चे दिल से माफी माँगें – अगर किसी का दिल दुखाया है तो ईमानदारी से क्षमा मांगने से बहुत फर्क पड़ता है।
दान और सेवा करें – जरूरतमंदों की मदद करने से नकारात्मक ऊर्जा कम होती है।
सकारात्मक कर्म करें – दूसरों के लिए भलाई करने से शुभ ऊर्जा बढ़ती है।
प्रार्थना करें – भगवान से प्रार्थना करें कि जो भी गलती हुई, उसे क्षमा करें।
कर्म सुधारें – अगर कोई अन्याय हुआ है तो उसे सुधारने की कोशिश करें।
आध्यात्मिक मान्यता
कई ग्रंथों में लिखा है
- कर्मों का फल अवश्य मिलता है।
- इसलिए हाय से बचने का सबसे बड़ा उपाय है सच्चा कर्म, सच्चा दिल और सच्चा व्यवहार।



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