पंचम भाव का कुंडली में प्रभाव

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। सामान्यतः जन्मकुंडली के पंचम भाव से हम संतान, पुत्र, विद्या, यश, प्रेम-संबंध अर्थात प्यार- मोहब्बत, पूर्व जन्म के संचित कर्म, मंत्र-सिद्धि, जुआ, शेयर व सट्टा इत्यादि देखते है। यह भाव धर्म व लक्ष्मी का भाव भी कहलाता है। पंचम भाव के कारक स्वयं देव-गुरू बृहस्पति है, जो जातक को यश, कीर्ति, बुद्धि, ज्ञान, विवेक, लक्ष्मी व संतान इत्यादि की उपलब्धि कराते हैं। यदि हम ज्योतिष चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो पंचम भाव हृदय, अमाषय, जिगर, तिल्ली, आंत इत्यादि का भी है। अगर जन्मकुंडली में प ंचम भाव, पंचमेश व पंचम कारक बृहस्पति शुभ प्रभाव युक्त हो तो जातक को यश, कीर्ति, बुद्धि, ज्ञान, अच्छी संतान, लक्ष्मी व राज्यकृपा इत्यादि प्राप्त होती है। यदि पंचम भाव में पापी ग्रह स्थित हो व पंचम भाव, पंचमेश व बृहस्पति पाप प्रभाव में हो तो फिर यश, बुद्धि, ज्ञान अच्छी संतान प्राप्त नहीं होती, फिर अपयश प्राप्त होता है, पेट, हृदय, जिगर तिल्ली व आंतों आदि के रोग हो जाते है व संतान प्राप्ति नहीं होती। संतान हो भी जाए तो मान-सम्मान व सेवा करने वाली नहीं हाती। सूर्य देव का पंचम में स्थित होना संतान हेतु अशुभ होता है। पंचम में नीच का सूर्य हो तो पुत्र अरिष्ट व पंचम पर सूर्य की दृष्टि हो तो पुत्र दोष होता है।
यदि स्त्रियों की कुंडली में पंचम भाव में मंगल अशुभ भावों का स्वामी होकर स्थित हो तो वह भी गर्भपात का जिम्मेदार होता है। पंचम में मंगल, राहु, केतु परिधि में हो तो सर्प दोष हेाता है।
पंचम भाव या पंचमेश व नवम भाव या नवमेश पर शनि, मंगल, राहु व केतु का प्रभाव हो तो ये जातक को तकनीकी शिक्षा प्रदान करते हैं। पंचम में केतु तंत्र – मंत्र की विधा भी प्रदान करता है। बुध-बृहस्पति का प्रभाव वाणिज्य व प्रबंधन शिक्षा प्रदान करता है।
यदि पंचम भाव में राहु स्थित हो व पंचमेश अष्टम में पाप ग्रहों से युक्त-दुष्ट हो तो पितृ दोष होता है।
पंचम भाव जातक के कर्मों की आयु का भी भाव है अर्थात यदि पंचम, पंचमेश व बृहस्पति शुभ प्रभाव में हों तो जातक उसके द्वारा किए गए कर्मों की छाप से लम्बबे समय तक पहचाना जाता है। पंचम भ्ज्ञाव का सबसे बड़ा काय्र जातक को धर्म से जोड़ना व सत्यगती प्रदान करना भी है। पदवी संतान अर्थात पूर्वजन्म के कर्मों द्वारा सत्यगति प्राप्त होना। पंचम भाव संतान भाव पूर्व जन्म के पुण्यों फलों का भी भाव का कर्म भाव है।
यदि पंचमेश शुभ भाव अर्थात केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो तो उसका रत्न धारण कर सकते हैं। पंचम कारक बृहस्पति यदि शुभ भाव का स्वामी होकर शुभ भाव अर्थात केंद्र-त्रिकोण में स्थित हो तो पुखराज रत्न धारण कर सकते हैं व बृहस्पति से संबंधित वस्तुओं जैसे केसर, हल्दी तिलक, पीले-पुष्प, वस्त्र, पीली चने की दाल इत्यादि के उपयोग से लाभ होगा। यदि कुंडली में पितृदोष है तो उकसी पूजा लाभप्रद होगी। यह लेख के स्वरचित विचार हैं। (साभार ज्योतिषाचार्य: दलबीर सिंह)

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