सर्वप्रथम महाभारत काल से हुई थी अनंत चतुर्दशी व्रत की शुरुआत

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की भाद्रपद मास के चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी कहा जाता है, इसे अनंत चौदस भी कहते हैं। यह तिथि श्री हरि भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इस दिन व्रत रखकर विधि विधान से भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कष्टों का निवारण होता है। इस दिन गणेशोत्सव का भी समापन होता है। महाराष्ट्र और गुजरात समेत पूरे भारत में इस दिन को गणेश विसर्जन के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को 14 वर्षों तक लगातार करने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथाओं में भी इस व्रत का खास उल्लेख किया गया है। इस बार अनंत चतुर्दशी का पावन पर्व 19 सितंबर दिन रविवार को है। सनातन हिंदु धर्म में अनंत चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इस दिन श्रीहरि भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा की जाती है। जिन्होंने ऋष्टि की रचना में 14 लोकों यानि तल, अतल, वितल, सुतल, सलातल, रसातल, पाताल, भू, भवः, स्वः, जन, तप, सत्य मह की रचना की थी। इन समस्त लोकों की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने अनंत रूप धारण किए थे, जिससे वह अनंत प्रतीत होने लगे। इसलिए इस व्रत को अनंत चतुर्दशी व्रत कहा जाता है। विधि विधान से इस व्रत का पालन करने से मनुष्य के सभी कष्टों का निवारण होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार लगातार 14 वर्षों तक अनंत चतुर्दशी का व्रत करने से मनुष्य को विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। इस व्रत को लेकर मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखने के साथ भगवान विष्णु के सहस्त्रनाम स्रोत का पाठ करता है उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। अनंत चतुर्दशी व्रत की शुरुआत सर्वप्रथम महाभारत काल से हुई थी।

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