समाचार सच, हल्द्वानी। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्या पर उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के मानविकी विद्याशाखा द्वारा आयोजित मातृभाषा उत्सव और विचार-विमर्श सत्र में भाषाई विविधता और वैश्विक सांस्कृतिक संवाद पर गहन चर्चा हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि मातृभाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान, आत्मीयता और वैश्विक बंधुत्व की आधारशिला हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भाषाई शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि भाषाई संप्रभुता की स्वीकार्यता से आती है। विश्वविद्यालय शीघ्र ही प्राकृत, पालि और अपभ्रंश जैसी प्राचीन भाषाओं के साथ स्पेनिश, चीनी और जापानी भाषाओं के पाठ्यक्रम भी प्रारंभ करेगा, जिससे विद्यार्थियों के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि मातृभाषा केवल भावनात्मक जुड़ाव नहीं, बल्कि समझ और नवाचार की सबसे मजबूत जमीन है। भाषाई विविधता को स्वीकार करना ही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की वास्तविक भावना है।
विषय प्रवेश करते हुए वक्ताओं ने बताया कि भाषा की अस्मिता और सम्मान के लिए यूनेस्को द्वारा अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया गया, जिसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में मातृभाषाओं की भूमिका को रेखांकित करना है।
विदेशी विद्वानों ने भी भाषाई समावेशन को वैश्विक पहचान का आधार बताया। लिस्बन विश्वविद्यालय के भाषाविदों ने मातृभाषा को आत्मीय समझ का माध्यम बताया, जबकि हैम्बर्ग विश्वविद्यालय के विद्वानों ने भाषा को सांस्कृतिक स्मृति, परंपरा और विश्वदृष्टि का मूल आधार बताया।
कार्यक्रम में बहुभाषिक सांगीतिक प्रस्तुति, मातृभाषाओं में काव्यपाठ और हस्ताक्षर अभियान मुख्य आकर्षण रहे। शोधार्थियों के लिए आयोजित निबंध प्रतियोगिता में विभिन्न विभागों के विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी और कार्मिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे, जिन्होंने मातृभाषा संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लिया।



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