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होलिका दहन की लौ से मिलते हैं शुभ-अशुभ संकेत, होली की रात को कहा गया है महारात्रि

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। दीपावली और शिवरात्रि की तरह होलिका दहन की रात को भी कहा गया है महारात्रि, इसमें की गई पूजा से मिलता है विशेष फल। फाल्गुन पूर्णिमा 28 मार्च रविवार को होलिका दहन किया जाएगा। इस बार होली पर भद्रा का अशुभ योग नहीं रहेगा और होलिका दहन के लिए करीब 2 घंटे 10 मिनट का समय मिलेगा। होलिका दहन के दिन भद्राकाल सुबह सूर्याेदय से शुरू होकर दोपहर में ही खत्म हो जाएगा। इसलिए शाम को गोधूलि बेला में होलिका दहन करना शुभ रहेगा।
होलिका दहन की लौ से मिलते हैं शुभ-अशुभ संकेत
होलिका दहन की लौ पूर्व दिशा की ओर उठती है तो इससे आने वाले समय में धर्म, अध्यात्म, शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में उन्नति के अवसर बढ़ते हैं। वहीं पश्चिम में आग की लौ उठे तो पशुधन को लाभ होता है। उत्तर की ओर हवा का रुख रहने पर देश व समाज में सुख-शांति बनी रहती है। इसके अलावा दक्षिण दिशा में होली की लौ हो तो अशांति और क्लेश बढ़ता है। झगड़े-विवाद होते हैं। पशुधन की हानि होती है। आपराधिक मामले बढ़ते हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा भी होती है महारात्रि
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जगन्नाथपुरी के ज्योतिष डॉ. गणेश मिश्र का कहना है कि होलिका दहन की रात को भी दीपावली और शिव रात्रि की भांति ही महारात्रि की श्रेणी में शामिल किया गया है। होलिका की राख को मस्तक पर लगाने का भी विधान है। ऐसा करने से शारीरिक कष्ट दूर होते हैं। इस रात मंत्र जाप करने से वे मंत्र सिद्धि प्राप्त होती है। जीवन सुखमय बनता है, जीवन में आने वाली सभी परेशानियों का अपने आप निराकरण हो जाता है।
पूर्णिमा के दिन उग्र रूप में होता है राहू
डॉ मिश्र ने बताया कि होली से पहले के आठ दिनों में ग्रहों का अशुभ प्रभाव भी बढ़ जाता है। अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं। राहु के अशुभ प्रभाव से मानसिक तनाव, कन्फ्यूजन और अनजाना डर बढ़ता है। राहु के कारण ही कई लोग गलत फैसले ले लेते हैं। इसलिए राहु से बचने के लिए होलिका दहन में गाय के गोबर से बने उपले यानी कंडे जलाए जाते हैं। पूर्णिमा तिथि पर पानी में गंगाजल और गोमूत्र मिलाकर नहाना चाहिए।

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