समाचार सच, नैनीताल डेस्क। उत्तराखंड के नैनीताल के जंगलों में पाया जाने वाला किंग कोबरा अपने अनोखे व्यवहार और प्रजनन की विशेषताओं के कारण शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां समुद्र तल से करीब 2300 मीटर की ऊंचाई पर किंग कोबरा का घोंसला मिलना खास महत्व रखता है। मादा किंग कोबरा चीड़ और बांज की पत्तियों से घोंसला तैयार करती है, जो बारिश के मौसम में भी उसके अंडों को सुरक्षित रखने और अनुकूल परिस्थितियां बनाए रखने में मदद करता है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अंडों की सुरक्षा के लिए मादा करीब दो महीने तक घोंसले के आसपास डटी रहती है। इस दौरान वह लंबे समय तक भोजन नहीं करती। वन अनुसंधान से जुड़े अध्ययनों में किंग कोबरा के प्राकृतिक आवास, व्यवहार और संरक्षण को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं।
उत्तराखंड में किंग कोबरा की मौजूदगी को समझने के लिए वर्ष 2021 में इसके विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन किया गया था। शोध के अनुसार, नैनीताल वन प्रभाग की भवाली और मनोरा रेंज में इसकी मौजूदगी अधिक दर्ज की गई। इसके अलावा देहरादून और पौड़ी सहित प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी इस दुर्लभ सांप की उपस्थिति सामने आई है।
आमतौर पर किंग कोबरा को दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट के वर्षावनों से जोड़कर देखा जाता है। केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है। ऐसे में उत्तराखंड के पहाड़ी जंगलों में इसका पाया जाना वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मुक्तेश्वर क्षेत्र में लगभग 2300 मीटर की ऊंचाई पर घोंसला मिलने की घटना को विशेष माना गया है।
किंग कोबरा के प्रजनन व्यवहार की सबसे खास विशेषताओं में मादा का घोंसला बनाना शामिल है। शोध के मुताबिक, जून से अगस्त के बीच मादा चीड़ और बांज की पत्तियों को इकट्ठा कर गुंबदनुमा घोंसला तैयार करती है। पत्तियों की यह संरचना अंडों को सुरक्षित रखने और उनके आसपास अनुकूल तापमान बनाए रखने में मदद करती है।
अंडे देने के बाद मादा लंबे समय तक उनकी रखवाली करती है। इस दौरान वह भोजन से दूरी बनाए रख सकती है और घोंसले की सुरक्षा पर ध्यान देती है। बारिश, कीटों और अन्य प्राकृतिक चुनौतियों के बीच अंडों की रक्षा करने का उसका व्यवहार वन्यजीवों की दुनिया का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।
किंग कोबरा को उसके विशाल आकार और घातक विष के लिए जाना जाता है, लेकिन जंगल के पारिस्थितिक संतुलन में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसका प्रमुख आहार दूसरे सांप हैं। इनमें रैट स्नेक जैसी प्रजातियां भी शामिल हो सकती हैं। इस तरह यह जंगल की खाद्य शृंखला का अहम हिस्सा बना रहता है।
हालांकि, इसका विष बेहद घातक हो सकता है। इसलिए किंग कोबरा को देखकर उसके करीब जाने, उसे छेड़ने या पकड़ने की कोशिश करना जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे में सांप दिखाई देने पर वन विभाग या प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम की मदद लेना जरूरी है।
प्राकृतिक आवास के अलावा मानवीय गतिविधियां भी किंग कोबरा के अस्तित्व के लिए चुनौती बन रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022 से 2024 के बीच पांच किंग कोबरा की वाहनों से कुचलकर मौत हुई। यह स्थिति वन्यजीव संरक्षण के लिए चिंता का विषय है।
संवेदनशील वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की आवाजाही वाले मार्गों की पहचान, वाहन चालकों को जागरूक करना और सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के उपाय करना जरूरी है, ताकि इस दुर्लभ प्रजाति को सुरक्षित रखा जा सके।
शोध विवरणों के अनुसार, पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले किंग कोबरा की लंबाई 12 से 14 फीट तक बताई गई है, जबकि उत्तराखंड में इनकी औसत लंबाई करीब 10 से 12 फीट दर्ज की गई है। दोनों क्षेत्रों में पाए जाने वाले किंग कोबरा के डीएनए में भी अंतर सामने आने की बात कही गई है। इससे इनके आनुवंशिक संबंधों और अलग-अलग पर्यावरण में अनुकूलन को समझने के लिए आगे शोध की संभावनाएं बढ़ती हैं।
नैनीताल के जंगलों में किंग कोबरा की मौजूदगी उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती है। एक ओर मादा अपने अंडों की सुरक्षा के लिए लंबे समय तक संघर्ष करती है, वहीं दूसरी ओर यह सांप जंगल के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में योगदान देता है।
करीब 2300 मीटर की ऊंचाई पर घोंसला मिलने से लेकर पत्तियों से प्राकृतिक घोंसला तैयार करने तक, किंग कोबरा का व्यवहार शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण विषय है। इसके संरक्षण के लिए प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखना, सड़क दुर्घटनाओं को कम करना और लोगों में जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। इस दुर्लभ वन्यजीव को केवल खतरनाक सांप के रूप में देखने के बजाय प्रकृति के संतुलन में इसकी भूमिका को समझना भी जरूरी है।

सबसे पहले ख़बरें पाने के लिए -
👉 हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें
👉 फेसबुक पर जुड़ने हेतु पेज़ लाइक करें
👉 यूट्यूब चैनल सबस्क्राइब करें
हमसे संपर्क करने/विज्ञापन देने हेतु संपर्क करें - +91 70170 85440



