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जानिए क्या होता है, उत्तराखण्ड का लोक उत्सव हरेला पर्व, जानकारी दे रहे हैं डॉ0 गोपाल दत्त त्रिपाठी

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समाचार सच, हल्द्वानी (अध्यात्म डेस्क)। उत्तराखंड में हरेला पर्व लोक उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा आदिकाल से प्रचलित है। यह पर्व कर्क संक्रांति अर्थात श्रावण मास के एक गते को मनाया जाता है। इस दिन सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन में प्रवेश करता है। उत्तराखंड एक कृषि प्रधान देश है, अतः इस पर्व की महत्ता कृषि पर आधारित है। इस पर्व का प्रारंभ बीजारोपण से किया जाता है, कर्क संक्रांति के 9 या 10 दिन पूर्व पवित्र मिट्टी में अपने घर के देवालय के समीप 2 या 5 पात्रों में सप्तधान्य (धान, गेहूं, जौं, सरसों, चना, उड़द एवं मक्का) के बीजों को बो दिया जाता है। इन पात्रों को किसी दूसरे पात्रों से ढक दिया जाता है। प्रतिदिन इन पात्रों में जलसिंचन किया जाता है, इनमें हरित-पीत वर्ण के पौधे विकसित होते हैं। अच्छे पौधे देखकर अच्छी खेती या अच्छी आय का अनुमान लगाया जाता है। फिर मिथुनार्क आषाढ़ मास के अंतिम दिन सायं को किन पात्रों में शिव परिवार का आवाहन कर पूजन किया जाता है। जिसको लोक भाषा में डिकर कहते हैं। ये शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय एवं नंदी के प्रतीक माने जाते हैं।
कृषि में अतिवृष्टि, अनावृष्टि या अन्य प्रकार की आपत्तियों से बचाने के लिए शिव की आराधना की जाती है। पं नित्यानंद पंत महोपाध्याय के ‘वर्षकृत्यदीपक’ में हर काली व्रत पूजा प्रयोग के अनुसार शिव-पार्वती की पूजा निम्न मंत्र से की जाती है
हर नाम समुत्पन्ने हर काली हर प्रिये
सर्वदा सस्य मूर्तिस्थे प्रणतार्ति हरे नमः

इस मंत्र से सस्य मैं स्थापित देव प्रतिमाओ का षोडशोपचार अथवा रोली चावल पुष्प धूप दीप नैवेद्य से पूजन करने का विधान है। कर्क संक्रांति एक गते सावन मास 16 जुलाई को पुनः सस्यो की प्रतिष्ठा कर उन हरित पीत धान्य तृणों को अपने बंधु बांधवों के सिर में रखकर आशीर्वाद के रूप में रखने की परंपरा है। यह सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कहीं-कहीं मेलों का आयोजन भी किया जाता है जो ‘सह नौ अवतु’ इत्यादि भावना अभिव्यक्त करती है। आज के दिन पौधारोपण या वृक्षारोपण की परंपरा (पर्यावरण संरक्षण संवर्धन) का भी विधान है, जोकि हरित क्रांति का प्रतीक है।
-डॉ गोपाल दत्त त्रिपाठी
पूर्व प्रधानाचार्य श्री सनातन धर्म संस्कृत महाविद्यालय हल्द्वानी

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