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समस्याओं से नेताओं को नहीं सरोकार

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प्रेस कान्फ्रेंस में व्यस्त हैं तमाम जिम्मेदार

समाचार सच, हल्द्वानी (धीरज भट्ट)। राज्य बने बीस साल हो गये हैं लेकिन यहां की ज्वलंत समस्याओें का समाधान निकालने के बजाय यहां नेताजी प्रेस कान्फ्रेंस में व्यस्त हैं। इस दौरान तमाम दावे किये जाते हैं लेकिन धरातलीय स्तर पर ये दावे फिट नहीं बैठते हैं। जहां नेताजी प्रेस के माध्यम से अपनी बता जनता तक पहुंचाने में कामयाब हा जाते हैं लेकिन आम जनता को उससे कोई विशेष फायदा नहीं होता।
इधर चुनावी साल पास देखकर अब प्रेस कान्फ्रेंस करने वालों की बाढ़ सी आ गयी है। आलम यह है कि हर शहर में कहीं न कहीं नेताजी प्रेस से रूबरू हो रहे हैं।
ज्ञात हो कि चुनावों में अभी एक साल का समय बचा है लेकिन चुनावी साल होने के कारण नेताजी कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहते हैं। बड़े नेताओं की तो छोड़ो छोटे नेताजी भी अपनी राय रखने में पीछे क्यों रहें। कहने का तात्पर्य यह है कि लगभग सभी दलों के नेता अपनी बातों को रखने में पीछे नहीं हैं।
इधर हल्द्वानी में लंबे समय से सियासी दलों के जानकार एक सज्जन का कहना है कि राज्य बनने के बाद यह एक फैशन सा बन चुका है। उनका कहना है कि राज्य बनने के बाद नेताओं की बाढ़ सी आ गयी है और जाहिर सी बात है कि इस कारण प्रेस करने वाले नेताजी की संख्या में भी इजाफा होते जा रहा है। हालाकि इस दौरान इन नेताओं का रटा-रटाया से सवाल और जवाब होते हैं लेकिन वे ज्वलंत सवालों पर बोलने से बचते हैं या इसको दरकिनार कर देते हैं। मसलन राज्य में बेराजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थाई राजधानी समेत तमाम मामले हैं जिन पर कार्य करने की ईमानदारी से जरूरत है लेकिन इन सवालों पर कितना कार्य हुआ या इन पर कितना बोला गया। यह एक शोध का विषय हो सकता है लेकिन इससे आम जनता को कोई विशेष फायदा नहीं मिला।

पलायन पर बोलने वाले खुद हो चुके हैं पलायित
हल्द्वानी।
आये दिन पलायन पर बोलने वाले नेता पहाड़ से खुद पलायित हो चुके हैं। भले ही पलायन पर नेताजी ज्ञान बांटते फिरें लेकिन पहाड़ गवाह है कि यहां से प्रतिनिधित्व करने वाले राजनेता तो यहां रहते हैं ही नहीं। वे भले ही पलायन पर तमाम दावे करते हों लेकिन एक दिन भी पहाड़ में रहें तो अपने आप ही हकीकत से पाला पड़ेगा।

पहाड़ों में तमाम डाक्टरों के पद रिक्त
हल्द्वानी।
नेताजी भले ही अपने वादों में पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी कभी कभार बयान देते हैं लेकिन यह हकीकत है कि पहाड़ में तमाम चिकित्साधिकारियों के पद खाली होने से वहां के लोगों को इलाज के लिए अन्यत्र जाना पड़ता है। देखने में आया है कि यहां पर गर्भवती महिलाओं को डोली में लाना पड़ता है और जच्चा-बच्चा का स्वास्थ्य खतरे में आ जाता है।

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नेताजी मीटिंग में व्यस्त हैं कहकर झाड़ लिया जाता है पल्ला
हल्द्वानी।
अनेक बार ऐसा होेता है कि किसी समाचार का पक्ष जानने के लिए नेताजी को फोन मिलाने पर वहां से जवाब आता है कि या तो नेताजी मीटिंग में गये हैं या वो किसी प्रेस कांफ्रेस में व्यस्त हैं कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया जाता है।

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आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित है नेताजी
हल्द्वानी।
लोकतंत्र में अपनी बात रखने का हक सबको है लेकिन यहां पर राजनीतिक दल एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रहते हैं। हालाकि स्वस्थ आलोचना लोकतंत्र का ही एक हिस्सा है लेकिन अगर निन्दा की जाये तो यह लोकतंत्र को हानि पहुंचाता है।

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