समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। मृत्यु के कारण ही जीवन बहुत खूबसूरत है। जा जिंदा है वह और भले कुछ हो या न हो लेकिन उसकी मौत सुनिश्चित है। उसका मरना तय है भले कुछ और तय हो न हो। मौत जीवन की पूर्णता है। मौत जीवन का महत्तम महात्म्य है। जीवन मौत के ही सापेक्ष है। मौत न हो तो भला जीवन को इतना कीमती क्यों समझा जाय? जीवन यानी जिंदा रहना, इसीलिए सुंदरम आकांक्षा है, क्योंकि बड़े से बड़ा चक्रवर्ती राजा भी आज तक हमेशा जिन्दा नहीं रहा, इसीलिए उपनिषदों में कहा गया है मौत ही जीवन का मूल्य है, लेकिन इतनी सुनिश्चितता के बावजूद जीवित रहने का आनंद तभी है, जबकि मृत्यु का ठीक ठाक समय न ज्ञात हो। यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा वह क्या सत्य है जिसे हर कोई जानता है मगर कोई भी जानना नहीं चाहता ?
वह कौन सा आश्चर्य है जिसे हर कोई जानकार भी न हीं जानना चाहता? मृत्यु। जी हां! मौत। दुनिया में हर कोई इस बात को जानता है कि उसे मरना है, लेकिन कोई मरना नहीं चाहता। भविष्य जान लेने की ललक भला किस में नहीं होती। किसान कहो या वैज्ञानिक, अमीर हो या गरीब, राजा हो या भिखारी, साधु ही नहीं अपने परिजनों का, हितैषियों का, पड़ोसियों का यहां तक कि दुश्मनों का भी भविष्य जानना चाहता है, मगर ऐसा हो जाय तो बहुत खतरनाक हो जाय। अगर कोई अपना भविष्य बिल्कुल अक्ष्ज्ञरशः जान ले। जान लें कि इसमें एक शब्द भी इधर-उधर नहीं हो सकता। ऐसा हो जाय तो वाकई बहुत खतरनाक हो जाय। आदमी बहुत शैतान प्रवृत्ति का जीव है। अपना ही नहीं आस-पड़ौस में ही किसी का भविष्य जान जाए तो उसके अंदर शैतानी आकांक्षाएं हिलोरें मारने लगें।
पड़ोस के छुन्नू को मुन्नू के भविष्य का पता चल जाए तो समझो बहुत कुछ ऐसा हो जाए जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकता। अगर पता चल जाय कि मुन्नू के दुर्दिन आने वाले हैं तो छुन्नू पहले ही उससे किनारा कर ले। पता चल जाय कि मुन्नू का बहुत जल्द ही पत्ता साफ होने वाला है तो जितना कुछ फायदा उठाया जा सकता है छुन्नू वह सब उठा ले।
इसके उल्टा भी हो सकता है पता चल जाए कि पड़ोसी के अच्छे दिन आने वाले है तो फिर उसके आगे पीछे घूमने और चाटुकारिता करने वालों की लाइन लग जाय। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य का एक-दूसरे के प्रति स्नेह सौहार्द्र सहयोग सदभाव, पुरूषार्थ परिश्रम आदि तमाम बातें प्रभावित होंगी, इसलिए अनागत को न जान पाने की व्यवस्था करके परमात्मा ने मनुष्य का भला ही किया है। अदृश्य हो जाने की सिद्धि भी परमात्मा ने, मनुष्य का हित देखकर ही उसे प्रदान नहीं की।
यदि कोई अदृश्य होने की विद्या सीख ले तो वह बड़े से बड़ा अपराध करते रहने पर भ्ज्ञी न हीं पकड़ा जा सकेगा। इस प्रकार मनुष्य का निजी व्यक्तिगत जीवन कुछ रह ही न जायेगा। भविष्य को जानने और अदृश्य होने की सुविधा न देने के साथ परमात्मा ने मनुष्य की इंद्रियों को भ्ज्ञी उतनी ही क्षमता प्रदान की है, जितनी से कि उसका काम भर चलता रहे। इसी प्रकार जिन सिद्धियों की, जिन उद्देश्यों से आवश्यकता है वे सामान्य प्रयास करने पर ही मिल जाती है। मसलन गायन, वादन, संभाषण, वातालाप आदि लेकिन जिनके साधने के लिए बहुत अनुशासन चाहिए वो सबको नहीं मिलती। अगर वो सबको मिल जाएं या समझो अपात्र को मिल जाएं तो अनर्थ हो जाए, इसीलिए सिद्धियां सबको नहीं मिलती। राह चलते नहीं मिलती।

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