अब जानिए कि मंदिर जाने वाला कैसे उपरोक्त संकटों से मुक्त रहता है और उसे क्या लाभ मिलता है?

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क।

  1. मंदिर में शिखर होते हैं। शिखर की भीतरी सतह से टकराकर ऊर्जा तरंगें व ध्वनि तरंगें व्यक्ति के ऊपर पड़ती हैं। ये परावर्तित किरण तरंगें मानव शरीर आवृत्ति बनाए रखने में सहायक होती हैं। व्यक्ति का शरीर इस तरह से धीरे-धीरे मंदिर के भीतरी वातावरण से सामंजस्य स्थापित कर लेता है। इस तरह मनुष्य असीम सुख का अनुभव करता है। पुराने मंदिर सभी धरती के धनात्मक (पॉजीटिव) ऊर्जा के केंद्र हैं।
  2. पुराने मंदिर सभी धरती के धनात्मक (पॉजीटिव) ऊर्जा के केंद्र हैं। ये मंदिर आकाशीय ऊर्जा के केंद्र में स्थित हैं। उदाहरणार्थ उज्जैन का महाकाल मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है। ऐसे धनात्मक ऊर्जा के केंद्र पर जब व्यक्ति मंदिर में नंगे पैर जाता है तो इससे उसका शरीर अर्थ हो जाता है और उसमें एक ऊर्जा प्रवाह दौड़ने लगता है। वह व्यक्ति जब मूर्ति के जब हाथ जोड़ता है तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है। जब वह व्यक्ति सिर झुकाता है तो मूर्ति से परावर्तित होने वाली पृथ्वी और आकाशीय तरंगें मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तिष्क पर मौजूद आज्ञा चक्र पर असर डालती हैं। इससे शांति मिलती है तथा सकारात्मक विचार आते हैं जिससे दुख-दर्द कम होते हैं और भविष्य उज्ज्वल होता है। नंगे पैर भूमि कर चलने से पैरों के पॉइंट पर दबाव पड़ता है जिससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल रहता है।
  3. मंदिर में प्रवेश से पूर्व शरीर और इंद्रियों को जल से शुद्ध करने के बाद आचमन करना जरूरी है। इस शुद्ध करने की प्रक्रिया को ही आचमन कहते हैं। आचमन करने से पहले अंगुलियां मिलाकर एकाग्रचित्त यानी एकसाथ करके पवित्र जल से बिना शब्द किए 3 बार आचमन करने से महान फल मिलता है। आचमन हमेशा 3 बार करना चाहिए। आचमन से मन और शरीर शुद्ध होता है।
  4. पूजा एक रासायनिक क्रिया है। इससे मंदिर के भीतर वातावरण की पीएच वैल्यू (तरल पदार्थ नापने की इकाई) कम हो जाती है जिससे व्यक्ति की पीएच वैल्यू पर असर पड़ता है। यह आयनिक क्रिया है, जो शारीरिक रसायन को बदल देती है। यह क्रिया बीमारियों को ठीक करने में सहायक होती है। दवाइयों से भी यही क्रिया कराई जाती है, जो मंदिर जाने से होती है।
  5. प्रार्थना में शक्ति होती है। प्रार्थना करने वाला व्यक्ति मंदिर के ईथर माध्यम से जुड़कर अपनी बात ईश्वर या देव शक्ति तक पहुंचा सकता है। देवता सुनने और देखने वाले हैं। प्रतिदिन की जा रही प्रार्थना का देवताओं पर असर होने लगता है। मानसिक या वाचिक प्रार्थना की ध्वनि आकाश में चली जाती है। प्रार्थना के साथ यदि आपका मन सच्चा और निर्दाेष है तो जल्द ही सुनवाई होगी और यदि आप धर्म के मार्ग पर नहीं हैं तो प्रकृति ही आपकी प्रार्थना सुनेगी देवता नहीं। प्रार्थना का दूसरा पहलू यह कि प्रार्थना करने से मन में विश्घ्वास और सकारात्मक भाव जाग्रत होते हैं, जो जीवन के विकास और सफलता के अत्यंत जरूरी हैं।
  6. प्रतिदिन मंदिर जाकर व्यक्ति अपने मस्तक पर या दोदों भौहों के बीच चंदन या केसर का तिलक लगाता है। इस तिलक लगाने जहां शांति का अनुभव होता है वहीं इससे एकाग्रता बढ़ती है। दरअसल जहां तिलक लगाया जाता है उसके ठीक पीछे आत्मा का निवास होता है। आज्ञाचक्र और सहस्रार चक्र के बीच के बिंदू पर आत्मा निवास करती है जोकि नीले रंग की है। आत्घ्ता अर्थात हम खुद। चंदन लगाने के आध्यात्मिक लाभ भी हैं।
  7. घंटी की आवाज हमारे मन और मस्तिष्क को हिलिंग की तरह होती है। शोधकर्ता कहते हैं कि जब मंदर की घंटी या घंटा बजता है तो 7 सेकंड्स तक उसकी गुंज हमारे कानों में गुंजती रहती है। इससे मन और मस्तिष्क में ऊर्जा का संचार होता है और दिमाग को बहुत सुकून मिलता है। यह हमारे शरीर की एनर्जी लेवल बढ़ाने में सहायक है। शारीरिक और आत्मिक शांति के बल पर ही आप दुनिया की हर झंझट से निपट सकते हैं।
  8. मंदिर में व्यक्ति हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। हाथ जोड़ने से जहां हमारे फेंफड़ों और हृदय को लाभ मिलता है वहीं इससे प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी होता है। कहते हैं कि हथेलियों और अंगुलियों के उन बिंदुओं पर दबाव पड़ा है जो शरीर के कई अन्य अंगों से जुड़े हैं। इससे उन अंगों में ऊर्जा का संचार होता है।
  9. मंदिर का सुगंधित वातावरण जहां हमारे मन और मस्तिष्क को शांत करता है वहीं इस वातावरण में रहने से बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं और किसी भी प्रकार का वायरल इंफेक्शन नहीं होता है क्योंकि मंदिर में कर्पूर और धुआं होता रहता है। साथ ही ध्वनि से भी बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं।
  10. प्रतिदिन मंदिर जाने वाले व्यक्ति में तनाव, चिंता, अवसाद और मानसिक रोग नहीं होते हैं। लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी हैं कि वह प्रतिदिन मंदिर केवल हाथ जोड़ने के लिए नहीं जाए। वहां जाकर पूर्ण नियम से प्रार्थना, पूजा या पाठ करें तो ही इसका लाभ मिलेगा। अन्यथा ऐसे बहुत है जो मंदिर में एक एक मिनट भी खड़े नहीं रहते हैं और बाहर हो जाते हैं।
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