कविता : बड़ी हो चली हैं बेटियां

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बड़ी हो रही हैं बेटियां, लगने लगा है मुझे अब डर,
अनहोनी की आशंका से घबराहट व होती है फिक्र।
जब तक नहीं पहुंचती हैं घर बेटियां, देखा रहता हूं डगर,
अखबारों की सुर्खियों को देखकर मचलने लगता है जिगर।
जब तक नहीं सुन लेता हूं, बेटियों की पापा-पापा,
खबरों को सुनकर खो बैठता हूं मन का आपा।
वन्दना व डॉली की सुरक्षा को लेकर रहता हूं परेशान,
बड़ी हो रही हैं बेटियां, लगने लगा है मुझे अब डर।
-धीरज भट्ट

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