“ये दिल मांगे मोर” से ओतप्रोत थे शहीद पैराट्रूपर धर्मेन्द्र कुमार…

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समाचार सच, हल्द्वानी। पैराट्रूपर धर्मेंद्र कुमार का जन्म नैनीताल जिले के कोटाबाग स्थित ग्राम पतलिया निवासी किसान श्री मोहनलाल शाह और श्रीमती सावित्री देवी के यहां दिनांक 15 मार्च 1991 को हुआ। मेजर बी एस रौतेला ने बताया कि धर्मेंद्र कुमार बचपन से ही कारगिल युद्ध में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा के विजय कोड “ये दिल मांगे मोर” से प्रेरित थे। गांव के विद्यालय से ही कक्षा बारहवीं उत्तीर्ण करने के बाद उनके पिता ने उनका दाखिला हल्द्वानी स्थित एमबीपीजी कॉलेज में बी ए प्रथम वर्ष में करवा दिया। उन्होंने बी ए प्रथम वर्ष की परीक्षा अच्छे अंको से उत्तीर्ण की तथा बी ए द्वितीय वर्ष में प्रवेश किया। उन्हीं दिनों ए आर ओ अल्मोड़ा की भर्ती हुई और धर्मेंद्र कुमार पहले ही प्रयास में भर्ती हो गए। फतेहगढ़ स्थित राजपूत रेजीमेंट केंद्र से बेसिक प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें पलटन में भेज दिया गया।

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लेकिन उनके मन में तो शुरू से ही कैप्टन विक्रम बत्रा के शब्द “ये दिल मांगे मोर” गूंजते थे। अतः उन्होंने पैदल सेना से पैरा कमांडो में जाने के लिए आवेदन किया। वहां भी  विशेष ट्रेनिंग में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद वे स्थाई रूप से पैराशूट रेजीमेंट में चले गए। पैरा में उनकी तैनाती सबसे पहले उत्तर पूर्व के अशांत क्षेत्र में की गई। वहां से दिसंबर 2016 में उन्हें जम्मू कश्मीर में तैनात किया गया।

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दिनांक 14 फरवरी 2017 को जम्मू कश्मीर के बांदीपुरा क्षेत्र में आतंकवादियों के साथ जबरदस्त मुठभेड़ हुई। पैराट्रूपर धर्मेंद्र कुमार ने वीरता और साहस का परिचय देते हुए एक आतंकवादी को ढेर कर दिया लेकिन इसी कार्यवाही के दौरान धर्मेंद्र कुमार भी बुरी तरह घायल हो गए। जिस कारण भारत मां का यह वीर सपूत शहीद हो गया। इनके वीरता और साहस की अनोखी मिसाल को देखते हुए इन्हें मरणोपरांत मेंशन इन डिस्पैच से सम्मानित किया गया।

उनके बलिदान दिवस पर कोटाबाग के पूर्व सैनिक लीग के अध्यक्ष कैप्टन धारा बल्लभ नैनवाल और कैप्टन शाह ने उनके घर जाकर उनके माता पिता जी का हाल जाना और साथ ही उन्हें यह विश्वास भी दिलाया कि हम सब आपके साथ हैं।

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