समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। वर्ष 2026 में 19 और 20 अक्टूबर को शारदीय नवरात्रि का पारण होगा। नवरात्रि में माँ दुर्गा की उपासना के साथ-साथ कन्या पूजन और भोज का अत्यंत विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि का व्रत और पूजन तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक कि कन्याओं का पूजन कर उन्हें आदरपूर्वक भोजन न कराया जाए। इस परंपरा में 9 कन्याओं को देवी का रूप और उनके साथ 1 छोटे बालक (लांगुरिया) को भगवान श्री हनुमानजी का प्रतीक मानकर पूजन व भोजन कराने का विधान है।
कन्या पूजन और भोज के मुख्य नियम
आमंत्रण – कन्याओं को एक दिन पूर्व या पूजन वाले दिन उनके घर जाकर सम्मानपूर्वक निमंत्रण देना चाहिए।
कन्याओं की आयु – पूजन के लिए बुलाई जाने वाली कन्याओं की आयु 2 वर्ष से अधिक और 10 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
संख्या – कम से कम 9 कन्याओं और 1 बालक (लांगुरिया) को भोजन अवश्य कराना चाहिए।
सात्विक भोजन – कन्याओं के लिए पूर्णतः सात्विक और मनपसंद भोजन बनाना चाहिए, जैसेकृपूरी, हलवा, खीर और काले चने की सब्जी।
भेंट व दक्षिणा : भरपेट भोजन कराने के उपरांत कन्याओं को अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा, वस्त्र या उपहार देकर विदा करें।
सम्मान व स्नेह – पूजन के दौरान कन्याओं के प्रति असीम आदर और स्नेह रखें। उन्हें किसी भी बात से दुखी न करें।
किस दिन करें कन्या पूजन?
कन्या पूजन और भोज का आयोजन अमूमन उसी दिन किया जाता है जिस दिन आपके घर में नवरात्रि का पारण होता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों व कुलाचार के अनुसार लोग सप्तमी, महाअष्टमी या महानवमी के दिन कन्या पूजन संपन्न करते हैं।
आयु अनुसार कन्याओं के 9 दिव्य रूप और मिलने वाला पुण्य
कुमारी पूजा में 2 से 10 वर्ष तक की कन्याएँ माँ दुर्गा के 9 अलग-अलग स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैंरू
कुमारिका (1 से 2 वर्ष): इनकी पूजा से धन-धान्य और सुख की प्राप्ति होती है।
त्रिमूर्ति (3 वर्ष): इनकी आराधना से घर में अन्न (धान्य) की कभी कमी नहीं होती और वंश वृद्धि होती है।
कल्याणी (4 वर्ष): इनका पूजन करने से जीवन में सुख, शांति और कल्याणी कृपा बनी रहती है।
रोहिणी (5 वर्ष): इनकी पूजा से स्वास्थ्य लाभ और हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है।
कालिका (6 वर्ष): इनका पूजन करने से विद्या, ज्ञान और यश की प्राप्ति होती है।
चंडिका (7 वर्ष): इनकी आराधना से ऐश्वर्य और सर्वत्र समृद्धि प्राप्त होती है।
शांभवी (8 वर्ष): इनका पूजन करने से पराक्रम, विजय और सभी संकटों से मुक्ति मिलती है।
दुर्गा (9 वर्ष): इनकी पूजा से शत्रुओं पर विजय और अलौकिक वैभव प्राप्त होता है।
सुभद्रा (10 वर्ष): इनकी आराधना से अखंड सौभाग्य और मनोवांछित फल की सिद्धि होती है।
चरण-दर-चरण कन्या पूजन की विधि
आसन पर बैठाना – आमंत्रित 9 कन्याओं और लांगुरिया (बालक) के घर आगमन पर उनके हाथ-पैर स्वच्छ जल या दूध-जल से धोएँ। इसके बाद उन्हें लकड़ी की चौकी या साफ आसन (कुश/कपड़े) पर बैठाएँ।
श्रृंगार व महावर – कन्याओं के पाँव पोंछकर उन पर आलता या महावर लगाएँ और उनके कंधों पर लाल चुनरी ओढ़ाकर उनका देवी रूप में श्रृंगार करें।
तिलक व आरती – सभी कन्याओं और बालक के माथे पर कुमकुम, अक्षत और चंदन का तिलक लगाएँ। उनके हाथों में कलावा (मौली) बाँधें। इसके पश्चात धूप-दीप दिखाकर उनकी आरती उतारें।
कन्या भोज और विदाई की विधि
भोजन परोसना – पूजन के पश्चात सभी कन्याओं और लांगुरिया को पंगत में बैठाकर आदरपूर्वक हलवा, पूरी, खीर और चने का प्रसाद परोसें।
भेंट व दक्षिणा – भोजन पूर्ण होने पर उनके हाथ धुलवाएँ। इसके बाद उन्हें दक्षिणा, रुमाल, चुनरी, फल, कंगन या खिलौने आदि उपहार स्वरूप भेंट करें।
चरण स्पर्श व आशीर्वाद – अंत में सभी कन्याओं और लांगुरिया के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें। उनके ऊपर अक्षत-पुष्प छिड़ककर उन्हें ससम्मान और प्रसन्नतापूर्वक विदा करें।

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