समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। कठोर धूप, ठंड और साधना के कारण उनका शरीर पूरी तरह काला पड़ गया था। जब भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए, तो उन्होंने गंगाजी के पवित्र जल से देवी के शरीर को मलमल कर धोया। जल स्पर्श होते ही उनका स्वरूप बिजली की चमक जैसा अत्यंत गौर और कांतिमान हो गया। तभी से उन्हें महागौरी कहा जाने लगा।
स्वरूप और पौराणिक महत्व
माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हज़ारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इस दौरान उनका संकल्प थाकृ ‘व्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात्’
अर्थात, वे शिवजी के अलावा किसी अन्य को पति रूप में स्वीकार नहीं करेंगी। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी लिखा हैरू- ‘जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरऊं संभु न त रहऊं कुंआरी॥’
विशेष दिन – शारदीय और चौत्र नवरात्रि का आठवां दिन (महाष्टमी)
स्वरूप – पूर्णतः गौर वर्ण, आयु आठ वर्ष मानी गई है (अष्टवर्षा भवेद् गौरी)
वस्त्र और आभूषण – पूर्णतः सफेद, इसी कारण इन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहते हैं
वाहन – वृषभ (बैल), जिसके कारण इन्हें वृषारूढ़ा कहा गया है
चार भुजाएं – ऊपर वाले दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले में त्रिशूल; ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे वाले में वर मुद्रा
मंत्र और स्तुति
स्तुति
श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया॥
मूल मंत्र
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥
पूजन विधि
तैयारी और संकल्प
अष्टमी के दिन प्रातः स्नान के बाद सफेद रंग के वस्त्र धारण करें। फिर पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़क कर उसे पवित्र करें और दीपक प्रज्वलित करें।
अभिषेक और श्रृंगार
माँ की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं। उन्हें सफेद या गुलाबी वस्त्र अर्पित करें। मोगरा, चमेली या कुंद के सफेद फूल और अक्षत चढ़ाएं।
भोग और नैवेद्य
माँ महागौरी को नारियल या नारियल से बनी मिठाई का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके अलावा हलवा, पूरी और काले चने का भोग भी लगाया जाता है।
कन्या पूजन (महाष्टमी का विधान)
2 से 10 वर्ष तक की नौ कन्याओं को घर बुलाकर श्रद्धा से उनके पांव धोएं। उन्हें साक्षात माँ का स्वरूप मानकर हलवा-पूरी और चने का भोजन कराएं, रोली-तिलक लगाएं और उपहार देकर उनका आशीर्वाद लें।
मां महागौरी की आरती-सलतपबे
।।माँ महागौरी की आरती।।
जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया।।
हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरा वहां निवासा।।
चंद्रकली और ममता अंबे।
जय शक्ति जय जय मां जगदंबे।।
भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्याता।।
हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा।।
सती ‘सत’ हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया।।
बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया।।
तभी मां ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया।।
शनिवार को तेरी पूजा जो करता।
मां बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता।।
भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो।।
(समाप्त)
मां महागौरी व्रत की कथा
परम कृपालु मां महागौरी कठिन तपस्या कर गौरवर्ण को प्राप्त कर भगवती महागौरी के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात हुईं। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान् शिव को पतिरूप में पाने के लिए इन्होंने हजारों सालों तक कठिन तपस्या की थी जिस कारण इनका रंग काला पड़ गया था परंतु बाद में भगवान शिव ने गंगा के जल से इनके वर्ण को फिर से गौर कर दिया और इनका नाम महागौरी विख्यात हुआ। अपने पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए बड़ी कठोर तपस्या की थी। इनकी प्रतिज्ञा थी कि श्व्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात्।श् (नारद पांचरात्र)। गोस्वामी तुलसीदासजी के अनुसार भी इन्होंने भगवान शिव के वरण के लिए कठोर संकल्प लिया था-
जन्म कोटि लगि रगर हमारी।
बरऊं संभु न त रहऊं कुंआरी॥
इस कठोर तपस्या के कारण इनका शरीर एकदम काला पड़ गया। इनकी तपस्या से प्रसन्न और संतुष्ट होकर जब भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विद्युत प्रभा के समान अत्यंत कांतिमान-गौर हो उठा। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा।

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