समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। हिन्दू जाति में अमावस्या तथा पूर्णिमा की तिथियों का विशेष माहात्म्य है। इसका कारण यह है कि ये एक पर्व तिथियां हैं।
इस दिन पृथ्वी के किसी न किसी भाग में ग्रहण अवश्य होता है, जिसे हिन्दू समाज में दान पुण्य के लिए विशेष महत्व दिया जाता है। जब चन्द्रमा और सूर्य एक साथ आ जाते हैं, तब अमावस्या होती है और जब चन्द्रमा पूर्ण दिखाई पड़ता है तो पूर्णिमा होती है।
आकाश मण्डल में चन्द्रमा में चन्द्रमा सूर्य से नीचे अवस्थित है। अतः पूर्णिमा को इसका काला भाग और अमावस्या को श्वेत भाग सूर्य की ओर रहता है, अतः ऐसे पर्वों पर दिए गए दान-पुण्य की विशेष महिमा होती है, क्योंकि सूर्य की प्रखर किरणों द्वारा वाष्प रूप में खींचे गए तत्व उस चन्द्र मण्डल में पहुंच जाते हैं, जहां हमारे पितरों का निवास माना गया है। इसी से इन तिथियों में पितरों के श्राद्धदि की भी विशेष महिमा धर्मशास्त्रों में बताई गई है।
धार्मिक लोग प्रत्येक अमावस्या को अपने पितरों के उद्देश्य से पिण्डदानादि करते हैं और उस दिन को सदाचारपूर्वक बिताते हैं। जो लोग पिण्डदान नहीं करते, वे भी तर्पण करते हैं तथा क्षौर-कर्म आदि नहीं कराते। इसी प्रकार पूर्णिमा को देवपूजन की पवित्र तिथि के रूप में मान्यता दी गई है। इस तिथि को भी अनेक धार्मिक लोग दिन भर का व्रत रखकर सत्यानारायण की कथा का आयोजन और दान-पुण्य भी करते हैं।

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