गाय के गोठ की शादी सिमटी इतिहास के पन्नों में

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परम्पराओं को छोड़ रही नयी पीढ़ी

समाचार सच, संस्कृति डेस्क। पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे परिवेश पर व्यापक प्रभाव डाला है। इसका प्रभाव हमारे सामाजिक क्रिया कलापों विशेषकर शादियों पर भी डाला है। पहले शादी के दौरान जो कार्यक्रम होते थे, उनमें गोठ की शादी का विशेष महत्व था पहाड़ों में गोठ का मतलब मवेशियों के निवास से होता है। घर में ऊपरी मंजिल में लोगों की रिहाइश होती थी, वहां निचली मंजिल में उनके मवेशियों (गाय, भैंस) के बांधने का स्थान नियत होता था। शादी से पहले यहां के मवेशियों को दूसरे स्थान पर बांधा जाता था और गोठ को लीप का वहां पर शादी के रात के कार्यक्रम निपटाये जाते थे।

1980 के दशक के अन्त में जब से एक दिनी शादी का प्रचलन हुआ तब से गोठ की शादियां पर विराम लग गया है। पहाड़ों के बुजुर्ग बताते है कि धूलि अर्ध्य बाद अन्य कार्यक्रम गोठ में निपटाये जाते थे। सात फेरों के लिए कन्या और वर बाहर आंगन में आते थे। 77 वर्षीय सरूली देवी बताती है कि गोठ की शादी में एक तरफ वर पक्ष तो दूसरी तरफ कन्या पक्ष के लोग बैठते थे। इस दरमियान दोनों पक्षों के परिवारिक जन ही बैठते थे। इसके अलावा दोनों पक्षों के पंडित शादी सम्पन्न कराने के लिए शामिल होते थे। खाना खाने के बाद गांव की महिलायें भी गोठ की शादी को देखने के लिए आती थी।

इस दौरान दोनों पक्षों के लोग एक दूसरे की कुशल क्षेम पूछने भी लगे रहते थे। शकुन आखर गाने वाली महिलाएं भी गोठ की शादी की रौनक बढ़ाती थी। गोठ की शादी में एक परम्परा यह भी थी यह कन्या को कपड़े भी जेवर आदि गोठ में ही पहनाये जाते थे। इस समय कन्या पक्ष की तरफ से वर पक्ष की तरफ थोड़ी देर के लिए साड़ी या धोती का पर्दा लगा दिया जाता था समय के करवट लेने के साथ यह परम्परा धूमिल पड़ती जा रही है। आज यहां के युवा पीढ़ी गोठ शब्द से ही परिचित नहीं है तो वह गोठ की शादी के बारे में क्या जानेंगे। इससे स्पष्ट है कि हम अपनी परम्पराओं से विमुख होते जा रहे हैं।

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