समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। 1. जब भी नये भवन में प्रथम बार प्रवेश करें जो ‘ऊँ’ का उच्चारण करते हुए प्रवेश करें।
- गृहस्थ यथासम्भव अपने ससुराल वालों से मधुर सम्बन्ध बनाये रखें।
- अपने बैठने, सोने या काम करने का स्थान यथासम्भव किसी बीम के नीचे न रखें। यदि मजबूरी वश ऐसा ही करना पड़े तो बीम की ऐसे डेकोरेशन करवालें जिससे वह कवर हो जाये।
- अपनी कार्य टेबल, डेस्क, काउण्टर पर पुस्तकों, फाइलों या सामान का अम्बार-ढेर न लगायें। वहां मात्र उपयोगी सामान ही रखें।
- आवास या व्यवसाय स्थल के केंद्र में कोई भारी खम्बा, दीवार या फिर भारी भरकम सामान न रखें।
- प्रवेश द्वार सदा स्वच्छ, सुन्दर और सजा हुआ ही बरकत देता है।
- फाल्स सीलिंग और फाल्स फ्लोरिंग दोनों एक ही स्थान में यथासम्भव नहीं होनी चाहिए।
- पानी का स्त्रोत पूर्व अथवा उत्तर पूर्व में होने श्रेयकर हेाते हैं।
- कार्यालय या कार्य स्थल में ‘गणेश जी’ की प्रतिमा रखना मंगलकारी मानी जाती है।
- रसोई दक्षिण-पूर्व में होना श्रेस्कर होती है। यदि अन्य स्थान में हो तो रसोई में हनुमान जी की सिंदूरी रंग की 939 आकार की मूर्ति होनी चाहिए।
- सीढ़ियों को यथासम्भव दक्षिण, दिशा में रखें और उनके नीचे के स्थान में टायलेट या बाथरूम न बनवायें।
- शयनकक्ष में शीशा या ड्रेसिंग टेबल इस प्रकार रखा जाये, जिससे उसमें बिस्तर दिखाई न दें।
- सोते समय सिर पूर्व दिशा में रहना चाहिए।
- सुख – समृद्धि चाहिए तो फटे जूते – चप्पल और मोजे कभी न पहनें।
- धार्मिक चित्र आमने सामने न लगायें।
- मकड़ी के जाले घर में दरिद्रता और रोग कारक होते हैं।
- फर्श की ढलान मुख्य द्वार की ओर होना चाहिए।
- घर में डरावने चित्र या तस्वीरें नहीं लगानी चाहिए।
- देवालय, पूजा का स्थान, धार्मिक/तीर्थ स्थान दैविक जीवनी शक्ति के शक्तिशाली स्रोत होते हैं। अतः उनमें श्रद्धा, सहयोग और विश्वास बनाये रखना चाहिए।
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