जीवटता की पर्याय बनी पहाड़ों की नारी

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समाचार सच, हल्द्वानी (धीरज भट्ट)। विपरीत परिस्थितियों में भी कार्य करना ही उत्तराखण्ड की नारी की पहचान है। बाघ के जबड़ों से बचकर आना हो, लकड़ी व घास लाने में अपने प्राणों की बाजी लगा देना भी उनकी खासियत है। बीते दिनों पिथौरागढ़ में महिलाओं की जीवटता के आगे बाघ को भी भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा महिलाओं के साहस व वीरता की घटनाओं की लम्बी फेरहिस्त है।

गौरतलब है कि प्राचीन समय से ही उत्तराखण्ड का इतिहास महिलाओं की वीरगाथा से भरा है। तमाम क्षेत्रों में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। इधर उत्तराखण्ड के निर्माण के दौरान महिलाओं का योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 1994 में उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान भी राज्य की महिलाओं ने योगदान दिया। उत्तर प्रदेश में रामपुर तिराहे के पास महिलाओं का जो अपमान हुआ था उसे कैसे भूला जा सकता है। जहां मैदानी क्षेत्रों में लोग थोड़ा पैदल चलना भी अपनी शान के खिलाफ समझते हैं वहीं पहाड़ों में पैदल चलना ही महिला की जीवटता की पहिचान है। भले ही महिलाओं के योगदान से पहाड़ ऋणी है लेकिन महिलाओं को जो मुकाम मिलना चाहिए था वह अभी तक उन्हें नहीं मिल पाया है।

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घस्यारी व पन्यारी

पहाड़ों में घास व पानी लाने में महिलाओं की अधिकतर जिंदगी बीत जाती है। पहाड़ में ये दोनों कार्य अधिकतर महिलाओं के ही जिम्मे है। ये कार्य दुश्कर माने जाते हैं। घास व पानी इकट्ठा करने वाली महिला इसी लिए पहाड़ में घास लाने वाली महिला को घस्यारी और पानी लाने वाली महिला को पन्यारी के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इधर राज्य में कर्णावती रानी, महारानी गुलेरिया, टिंचरी माई, जियाराणी, तीलू रौतेली, बच्छेंद्री पाल, गौरा देवी, कुंती वर्मा, लक्ष्मी देवी टम्टा, मधुमिता बिष्ट, मृणाल पाण्डे, कमलेन्दुमति शाह, जसुली दत्ताल, गंगोत्री गर्ब्याल, ईला पंत आदि महिलायें प्रसिद्ध हैं।

वीरता पर्याय बनी बहादुर बेटी राखी रावत

उत्तराखण्ड की बहादुर बेटी राखी रावत ने खुद की जान की बाजी लगाकर गुलदार के हमले से भाई की जान बचाने वाली उत्तराखण्ड की बहादुर बेटी राखी रावत को 2020 में वीरता के लिये नई दिल्ली में राष्ट्रपति ने सम्मानित किया। पौड़ी गढ़वाल के बीरोंखाल ब्लॉक के देव कुंडई गांव निवासी राखी रावत पुत्री दलवीर सिंह रावत 4 अक्टूबर 2019 को अपने चार साल के भाई राघव और मां के साथ खेत में गई थी। खेत से घर लौटते समय गुलदार ने भाई पर हमला किया, भाई को बचाने के लिए राखी उससे लिपट गई थी। आदमखोर गुलदार के लगातार हमले से लहुलुहान होने के बाद भी राखी ने भाई को नहीं छोड़ा। जिस पर राखी की मां के चिल्लाने की आवाज से गुलदार भाग गया था। राखी की इस बहादुरी के लिए राखी को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के तहत मार्कण्डेय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारतीय बाल कल्याण परिषद (आईसीसीडब्ल्यू) की ओर से दिल्ली में आयोजित भव्य कार्यक्रम समारोह में राखी को यह पुरस्कार असम राइफल्स के ले. कर्नल रामेश्वर राय के करकमलों से दिया गया।

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