डॉक्टर आचार्य सुशांत राज
समाचार सच, देहरादून। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी के रूप में मनाया जाता है। इस बार आंवला नवमी 23 नवंबर मनाई जाएगी। इस दिन मुख्य रूप से आंवले के वृक्ष का पूजन करने का विधान है। डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने बताया की अक्षय नवमी या आंवला नवमी को हिंदू संस्कृति में सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। इस उत्सव को हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष के नौवें दिन (नवमी तिथि) मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 23 नवंबर को है। यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भारतीय संस्कृति का पर्व है। इस दिन आंवले के पेड़ का पूजन कर परिवार के लिए आरोग्यता व सुख -सौभाग्य की कामना की जाती है। इस दिन किया गया तप, जप, दान इत्यादि व्यक्ति को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त करता है तथा सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है। शास्त्रों के अनुसार अक्षय नवमी के दिन आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु एवं शिवजी का निवास होता है। मान्यता है कि इस दिन इस वृक्ष के नीचे बैठने और भोजन करने से सभी रोगों का नाश होता है।
आंवला नवमी की कथा : कथा के अनुसार एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वीलोक पर भ्रमण करने आईं। पृथ्वी पर आने के पश्चात मां लक्ष्मी को श्री हरि भगवान विष्णु और शिव जी की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई। तब उन्हें स्मरण हुआ कि नारायण की प्रिय तुलसी और भगवान शिव के स्वरूप बैल के गुण आंवले के वृक्ष में होते है। तब लक्ष्मी जी ने सोचा कि जब इस वृक्ष में दोनों का अंश है तो इस वृक्ष की ही पूजा की जाए। उसके बाद मां लक्ष्मी ने आंवले को ही शिव जी और विष्णु जी का स्वरूप मानकर पूजा की। जिससे प्रसन्न होकर दोनों देव एक साथ प्रकट हुए। तब मां लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को खिलाया था। कहा जाता है कि इसी कारण आज भी कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन आंवला के पेड़ की पूजा का प्रावधान है। आंवला नवमी का महत्व : इसकी कथा मां लक्ष्मी से जुड़ी होने के कारण इस दिन सबसे पहले मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है। उसके बाद आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। इस दिन पूजा करने से मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु और शिवजी की कृपा भी प्राप्त होती है। आंवला के बारे में उल्लेख मिलता है कि इसका सेवन करने मात्र से ही श्री हरि प्रसन्न होते हैं। माना जाता है जहां पर आंवला का वृक्ष होता है वहां विष्णु जी का वास होता है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है।
आवंला नवमी की पूजा विधि :-
सुबह उठकर स्नानदि करने के पश्चात आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध अर्पित करें। उसके बाद रोली, अक्षत, पुष्प, गंध चढ़ानी चाहिए। उसके बाद दीपक प्रज्वलित करें और विधिवत रूप से आंवले के पेड़ की पूजा करें और कथा सुने। इसके बाद सात बार वृक्ष की परिक्रमा अवश्य करें।
आंवला का सेवन है लाभकारी : पद्म पुराण के अनुसार आंवला फल श्री हरि को प्रसन्न करने वाला व शुभ माना गया है। इसके भक्षण मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। आंवला खाने से आयु बढ़ती है उसका रस पीने से धर्म-संचय होता है और उसके जल से स्नान करने से गरीबी दूर होती है तथा सब प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। आंवले का दर्शन, स्पर्श तथा उसके नाम का उच्चारण करने से वरदायक भगवान श्री विष्णु अनुकूल हो जाते हैं। जहां आंवले का फल मौजूद होता है वहां भगवान श्री विष्णु सदा विराजमान रहते हैं तथा उस घर में ब्रह्मा एवं सुस्थिर लक्ष्मी का वास होता है।
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