समाचार सच, देहरादून। पहाड़ी और वन संपदा से भरपूर उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना लगातार चुनौती बना हुआ है। एक तरफ राज्य सरकार बुनियादी ढांचे और योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है, वहीं दूसरी ओर वन भूमि से जुड़े कड़े नियम कई परियोजनाओं की रफ्तार थाम रहे हैं। इसी को देखते हुए अब राज्य ने केंद्र सरकार से नियमों में बदलाव की मांग तेज कर दी है।
प्रदेश का करीब 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा वन क्षेत्र में आता है, ऐसे में किसी भी विकास कार्य—चाहे वह सड़क निर्माण हो या अन्य परियोजना के लिए वन भूमि के उपयोग पर प्रतिपूरक वनीकरण (कंपनसेटरी अफॉरेस्टेशन) अनिवार्य है। वर्तमान व्यवस्था के तहत जितनी वन भूमि उपयोग में ली जाती है, उसके बदले दोगुनी जमीन पर वनीकरण करना पड़ता है। सीमित भू-क्षेत्र वाले राज्य के लिए यह शर्त बड़ी बाधा बनती जा रही है।
इसी कारण कई महत्वपूर्ण योजनाएं केवल भूमि उपलब्ध न होने के चलते अटक जाती हैं। राज्य में लैंड बैंक की कमी भी इस समस्या को और गंभीर बना रही है। हालांकि सरकार स्तर पर लैंड बैंक विकसित करने की बात होती रही है, लेकिन जमीनी प्रगति अपेक्षाकृत धीमी है।
राज्य सरकार का कहना है कि केंद्र और राज्य की परियोजनाओं के लिए अलग-अलग नियम लागू होना असमानता पैदा करता है। केंद्र की योजनाओं में जहां उपयोग की गई वन भूमि के बराबर ही वनीकरण की शर्त होती है, वहीं राज्य की योजनाओं पर दोगुनी जमीन का दबाव है। इसी विसंगति को दूर करने की मांग अब प्रमुखता से उठाई जा रही है।
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने भी स्पष्ट किया है कि प्रदेश में लगभग 71 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र वनाच्छादित होने के कारण हर परियोजना के लिए दोगुनी भूमि उपलब्ध कराना व्यवहारिक नहीं है। उन्होंने केंद्र से आग्रह किया है कि नियमों में समानता लाई जाए और डिग्रेडेड (खराब) भूमि को वनीकरण के विकल्प के रूप में शामिल किया जाए।
इसके साथ ही राज्य ने वन स्वीकृति से जुड़े अधिकारों में कटौती का मुद्दा भी उठाया है। पहले 1 हेक्टेयर तक की परियोजनाओं को मंजूरी देने का अधिकार राज्य के पास था, जिसे घटाकर 0.10 हेक्टेयर कर दिया गया है। इससे छोटे स्तर के विकास कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। राज्य सरकार चाहती है कि उसे फिर से 1 हेक्टेयर तक की परियोजनाओं को मंजूरी देने का अधिकार मिले, ताकि स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों में तेजी लाई जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में पर्यावरण संरक्षण और विकास दोनों को संतुलित करना जरूरी है। ऐसे में नियमों की सख्ती के साथ-साथ उनकी व्यावहारिकता पर भी विचार करना समय की मांग बन गई है।



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