समाचार सच, अध्यात्म डेस्क।
देरी से उठना, देरी से जगना।
लेन-देन का हिसाब नहीं रखना।
कभी किसी के लिए कुछ नहीं करना।
स्वयं की बात को ही सत्य बताना।
किसी का विश्वास नहीं करना।
बिना कारण झूठ बोलना।
कोई काम समय पर नहीं करना।
बिना मांगे सलाह देना।
बीते हुए सुख को बार-बार याद करना।
हमेशा अपने लिए सोचना।
‘‘दिमाग ठंडा हो, दिल में रहम हो, जुबान नरम हो, आँखों में शर्म हो तो फिर सब कुछ तुम्हारा है’’
उठिये
जल्दी घर के सारें, घर में होंगे पौबारे।
कीजिये
मालिश तीन बार, बुध, शुक्रवार और सोमवार।
नहाइये
पहले नीचे से पांव, गोड़, कमर, छाती, पीठ, मुहं, अंत मे सिर।
खाइये
दाल, रोटी, चटनी कितनी भी हो कमाई अपनी।
पीजिये
दूध खड़े होकर, दवा पानी बैठ कर।
खिलाइये
गाय को रोटी, चाहें पतली हो या मोटी।
पिलाइये
प्यासे को पानी, चाहे हो जावे कुछ हानि।
छोडिये
अमचूर की खटाई, रोज की मिठाई।
करिये
आयें का मान, जाते का सम्मान।
जाईये
दुःख में पहले, सुख में पीछे।
धोइये
दिल की कालिख को, कुटुम्ब के दाग को।
सोचिये
एकांत में, करो सबके सामने।
बोलिये
कम से कम, कर दिखाओ ज्यादा।
चलिये
तो अगाड़ी, ध्यान रहे पिछाड़ी।
सुनिये
सभी की, करियें मन की।
बोलिये
जबान संभल कर, थोडा बहुत पहचान कर।
रखिये
याद कर्ज के चुकाने की, मर्ज के मिटाने की।
भूलिये
अपनी बढ़ाई को और दूसरों की बुराई को।
छिपाइये
भोजन और भजन, भक्ति दिखाने की चीज़ नहीं।
लीजिये
जिम्मेदारी उतनी, सम्भाल सके जितनी।
धरिए
चीज जगह पर, जो मिल जावें वक्त पर।
उठाइये
सोते हुए को नहीं, गिरे हुए को।
लाइये
घर में चीज उतनी, काम आवे जितनी।
गाइये
सुख में राम को और दुःख मे भी राम को।
‘मुकेश शर्मा’
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