वन निगम पर आठ लाख का जुर्माना, पीएमजीएसवाई के तीन इंजीनियरों पर कराया मुकदमा दर्ज

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समाचार सच, हल्द्वानी/चम्पावत। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से बनी टकनागोठ-डांडा मल्ला सड़क और उससे जुड़े अधिकारी विवादों में घिर गए हैं। आरोप है कि पीएमजीएसवाई ने वन विभाग द्वारा हस्तांतरित की गई भूमि के इतर सड़क काटकर बिना छपान किए 37 पेड़ों को भी कटवा दिया। मामला संज्ञान में आने पर वन विभाग ने पीएमजीएसवाई के ईई समेत तीन अधिकारियों के खिलाफ वन अधिनियम की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया है। जबकि गलत तरीके से पेड़ काटने पर वन निगम पर आठ लाख से अधिक का जुर्माना ठोंका गया है। मामले की जांच आरएम कुमाऊं को सौंपी गई है।

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आपकों बता दें कि हल्द्वानी वन डिवीजन में शामिल 12 किमी लंबे टकनागोठ-डांडा मल्ला मोटर मार्ग के लिए 9.14 हेक्येटर भन भूमि हस्तांतरित हुई थी। आरोप है कि वन भूमि में फेरबदल करते हुए पीएमजीएसवाई के इंजीनियरों ने गैर कानूनी रूप से एलाइमेंट में बदलाव कर दिया। यही नहीं बिना मंजूरी के 37 पेंड़ों को भी काट दिया।

मामला सामने आने के बाद वन विभाग ने पीएमजीएसवाई के अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता और अवर अभियंता के खिलाफ वन अधिनियम की धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया है। साथ ही वन निगम पर भी गलत पेड़ काटने के आरोप में आठ लाख से अधिक का जुर्माना भी लगाया गया है। हालांकि वन विकास निगम ने अपने आप को इस मामले में पाक साफ बताया है।

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वन विकास निगम हल्द्वानी के महाप्रबंधक विवेक पांडेय का कहना है कि पीएमजीएसवाई ने सड़क के एलाइमेंट में जो बदलाव किया है इसका वन निगम से कोई लेना देना नहीं है। वन निगम को जो पेड़ बताए गए हैं वही काटे गए हैं। इधर इस पूरे मामले में सड़क बनाने वाली कंपनी एसकेटी बिल्डकॉन पर विवादों में घिर गई है। कंपनी पर कायदे कानूनों को ताक पर रखने का आरोप है। सड़क निर्माण में बरती गई धांधली उजागर होने के बाद विपक्षी दल भी इस मामले को लेकर लामबंद हो गए हैं। टकनागोठ-डांडा मल्ला मोटर मार्ग निर्माण में अनियमितता का मामला केंद्रीय पर्यावरण एवं परिवर्तन जलवायु मंत्रालय तक पहुंच गया है। वन संरक्षण नोडल अधिकारी डा. कपिल जोशी ने केंद्रीय मंत्रालय को भेजे पत्र में कहा है कि स्वीकृत नक्शे से से हटकर 12 किमी लंबी सड़क बनाई गई है। पत्र में बिना छपान किए पेड़ों को काटने का भी जिक्र किया गया है। उन्होंने कहा है कि यह पूरा प्रकरण सैद्धांतिक स्वीकृति और वन संरक्षण अधिनियम 1980 का खुला उल्लंघन है।

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