राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है होली
Holi, the festival of the power of devotion, Holashtak will start from February 27: Dr. Acharya Sushant Raj
समाचार सच, अध्यात्म डेस्क (देहरादून)। डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की भक्ति की शक्ति का त्योहार होली से ठीक आठ दिन पहले होलाष्टक शुरू हो जाते हैं और होलिका दहन के दिन तक चलते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन आठ दिनों में कोई भी मांगलिक कार्यक्रम जैसे शादी, ब्याह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि निषेध माने जाते हैं। इस बार होलिका दहन 7 मार्च, मंगलवार यानी आठ दिन पहले 27 फरवरी, सोमवार तिथि अष्टमी से होलाष्टक लग जाएंगे। ज्योतिष मान्यता के अनुसार होलाष्टक के दिनों में वातावरण में नकारात्मकता का प्रभाव रहता है। अष्टमी तिथि को चन्द्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध,चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु उग्र अवस्था में रहते हैं। जिस कारण ग्रहों की ऊर्जा काफी नकारात्मक रहती है। इसका प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव पर भी पड़ता है। इसलिए मान्यता है कि अगर इन दिनों में कोई शुभ काम किया जाता है तो उसका शुभ फल प्राप्त नहीं हो पाता।
होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय और नेपाली लोगों का त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
होली रंगों का तथा हँसी-खुशी का त्योहार है। यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध त्योहार है, जो आज विश्वभर में मनाया जाने लगा है। रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। यह प्रमुखता से भारत तथा नेपाल में मनाया जाता है। यह त्यौहार कई अन्य देशों जिनमें अल्पसंख्यक हिन्दू लोग रहते हैं वहाँ भी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते हैं। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं। राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षाेल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।
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