समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। अधिक मास लगभग हर 3 साल में एक बार आता है। इसे (पुरुषोत्तम मास) भी कहते हैं। इस बार वर्ष 2026 और हिंदू मास 2083 में अधिकमास ज्येष्ठ मास में रहेगा। सौर वर्ष (365 दिन) और चंद्र वर्ष (354 दिन) के बीच हर साल 10 से 11 दिनों का अंतर आता है। तीन साल में यह अंतर लगभग 1 महीने (33 दिन) का हो जाता है। इस अंतर को पाटकर दोनों कैलेंडरों में तालमेल बिठाने के लिए एक (अतिरिक्त महीना) जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहते हैं।
वर्ष 2026 में अधिकमास की कब से कब तक रहेगा?
शुरुआत: 17 मई 2026 (रविवार)
समाप्ति: 15 जून 2026 (सोमवार)
अधिकमास में क्या करते क्या नहीं करते हैं?
इस साल यह जेठ (ज्येष्ठ) के महीने में लग रहा है, इसलिए इसे (अतिरिक्त ज्येष्ठ मास) कहा जाएगा। धार्मिक दृष्टि से इस महीने में शुभ कार्य (जैसे शादी, मुंडन, या गृह प्रवेश) वर्जित होते हैं, लेकिन पूजा-पाठ और दान-पुण्य का फल कई गुना ज्यादा मिलता है। पिछला अधिकमास 2023 में (सावन) के महीने में पड़ा था, और अब 2026 के बाद अगला अधिकमास 2029 में आएगा। ऐसा माना जाता है कि अधिकमास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा-पाठ से दस गुना अधिक फल मिलता है।
अधिकमास में करें शुभ कार्य, खुल जाएंगे भाग्य
तीर्थ स्नान और सेवा
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। जगन्नाथ पुरी का क्षेत्र पुरुषोत्तम क्षेत्र कहलाता है। इसे श्रीक्षेत्र, श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि और श्री जगन्नाथ पुरी भी कहते हैं। पुराणों में इसे धरती का वैकुंठ कहा गया है। पुरुषोत्तम मास में यहां की यात्रा शुभ फलदायी मानी गई है। जगन्नाथ नहीं जा सकते हैं तो आसपास के तीर्थ क्षेत्र में स्नान करें। गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करना और मंदिरों में सेवा करना भी बहुत शुभ माना गया है।
श्री कृष्ण पूजा
अधिकमास के अधिपति देवता भगवान विष्णु है। इस मास की कथा भगवान विष्णु के अवतार नृःसिंह भगवान और श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है। अतरू इस मास में इन दोनों की पूजा करने से सभी तरह के संकट मिट जाते हैं। इस मास में श्रीकृष्ण, श्रीमद्भगवतगीता, श्रीराम कथा वाचन, गजेंद्र मोक्ष कथा, और श्रीविष्णु भगवान के श्री नृःसिंह स्वरूप की उपासना विशेष रूप से की जाती है। इस माह उपासना करने का अपना अलग ही महत्व है। जो वक्ति इस माह में व्रत, पूजा और उपासना करता है वह सभी पापों से छुटकर वैंकुठ को प्राप्त होता है।
अखंड दीपक
इस मास में शालिग्राम की मूर्ति के समक्ष घर के मंदिर में घी का अखण्ड दीपक पूरे महीने जलाएं। शालिग्राम नहीं है तो श्रीहरि विष्णु के चित्र के समक्ष दीपक जलाएं। इस एक शुभ उपाय से सभी जन्मों के पाप कट जाते हैं और जातक सुख, शांति एवं समृद्धिपूर्ण जीवन यापन करता है। इस मास में भगवान के दीपदान और ध्वजादान की भी बहुत महिमा है।
धार्मिक ग्रंथों का पाठ
इस मास में पुरुषोत्तम-माहात्म्य का पाठ भी अत्यन्त फलदायी है। यह नहीं कर सकते हैं तो इस माह में श्रीमद्भागवत की कथा का पाठ करना चाहिए या गीता के पुरुषोत्तम नाम के 14वें अध्याय का नित्य अर्थ सहित पाठ करना चाहिए। इस माह में विष्णु सहस्रनाम पाठ भी करना चाहिए। पौराणिक शास्त्रों में भगवान विष्णु के 1000 नामों की महिमा अवर्णनीय है। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ- हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है।
व्रत और उपवास
इस महीने व्रत करने वालों को एक समय भोजन करना चाहिए। भोजन में गेहूं, चावल, जौ, मूंग, तिल, बथुआ, मटर, चौलाई, ककड़ी, केला, आंवला, दूध, दही, घी, आम, हर्रे, पीपल, जीरा, सोंठ, सेंधा नमक, इमली, पान-सुपारी, शहतूत, मेथी आदि खाने का विधान है। मांस, शहद, चावल का मांड़, उड़द, राई, मसूर, मूली, प्याज, लहसुन, बासी अन्न, नशीले पदार्थ आदि नहीं खाने चाहिए। अधिक मास में व्रत रखने और सात्विक जीवन अपनाने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति होती है।



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