आंकड़ों को कैसे झूठलायेंगे जनाब!

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-महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी असमान
-दहाई तक भी नहीं पहुंचा प्रतिनिधित्व

समाचार सच, हल्द्वानी (धीरज भट्ट)। आज भले ही देश और विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की गूंज है, लेकिन विधानसभा व लोकसभा में महिलाओं प्रतिनिधित्व आज भी असंतोषजनक है। उत्तरखण्ड में अभी तक विधानसभा में जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व दहाई के आंकड़े को नहीं छू पाया है, वहीं लोकसभा में मात्र तीन ही महिलाएं लोकसभा के दहलीज पर पहुंची है।

गौरतलब है कि उत्तराखण्ड बनने के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनावों में चार महिलाएं चुनाव जीती थी। इनमें डॉ. इंदिरा हृदयेश, अमृता रावत, आशा नौटियाल व विजया बड़थ्वाल विधायक निर्वाचित हुई थी।

-2007 के विधानसभा चुनावों में अमृता रावत, आशा नौटियाल, विजया बड़थ्वाल और बीना महाराना विधायक निर्वाचित हुई थी।

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इधर तीसरे विधानसभा चुनाव में डॉ. इंदिरा हृदयेश, अमृता रावत, विजया बड़थ्वाल, शैला रानी रावत तथा सरिता आर्या विधायक रही थी। वहीं हरिद्वार के भगवानपुर सीट से विधायक सुरेन्द्र राकेश के निधन के बाद उनकी पत्नी ममता राकेश विधायक रही।

2014 में अल्मोड़ा के सोमेश्वर के विधायक अजय टम्टा के सांसद निर्वाचित होने पर उपचुनाव में रेखा आर्या चुनाव जीवने में सफल रहीं।

2017 के विधानसभा चुनावों में हल्द्वानी से डॉ. इंदिरा हृदयेश, सोमेश्वर से रेखा आर्या, लक्सर से ममता राकेश व गंगोलीहाट से मीना गंगोला विधायक बनीं। वहीं थराली के उपचुनाव में मुन्नी देवी व पिथौरागढ़ से चन्द्रा पन्त विधायक चुनी गयी।

इधर राज्य बनने के बाद दो महिला राज्य में राज्यपाल के पद को सुशोभित कर चुकी हैं। इनमें मारग्रेट अल्वा और बेबी रानी मौर्या है। बेबी रानी मौर्य वर्तमान में उत्तराखण्ड की राज्यपाल है।

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संसद में भी प्रतिनिधित्व कम
हल्द्वानी। लोकसभा में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व असंतोषजनक ही माना जायेगा। राज्य बनने के बाद 2014 के उपचुनावों में टिहरी से मालाराज्य लक्ष्मीशाह सांसद बनी। जो वहीं राज्य बनने से पूर्व अविभाजित उत्तर प्रदेश में 1952 में टिहरी से कमलेन्दु मतिशाह और 1998 में नैनीताल संसदीय सीट से इला पंत सांसद रह चुकी हैं। वहीं 2004 में अल्मोड़ा सीट से रेणुका रावत चुनाव हार गयी थी।

33 प्रतिशत के इंतजार में महिलाएं
हल्द्वानी। देश में भले ही महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर हमारे कर्णधार आये दिन बयान देते रहते हैं, लेकिन संसद व विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर चुप्पी साध लेते हैं। आज भी देश की संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का आंकड़ा दो अंकों के बीच ही लटका है। महिला दिवस हम हर साल मनाते हैं लेकिन महिलाएं अपने समान प्रतिनिधित्व के लिए इंतजार करते-करते थक गई हैं।

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