समाचार सच, देहरादून। डाक्टर आचार्य सुशांत राज ने बताया की 17 अक्तूबर से नवरात्रि आरंभ हो जाएगी। घर-घर मां की चौकी सजाकर उनका पूजन किया जाएगा। नवरात्रि का त्योहार हिंदू धर्म में बहुत आस्था और उल्लास के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि में नौ दिनों तक मां के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, नवरात्रि में भक्त मां को प्रसन्न करने के लिए विविध प्रकार से उनकी पूजा-आराधना करते हैं। सनातन धर्म में कोई भी पूजा भोग के बिना अधूरी मानी जाती है। इसलिए किसी भी देवी-देवता की पूजा करते समय भोग लगाना अनिवार्य है। सभी देवी-देवताओं को उनके प्रिय भोग लगाने से वे प्रसन्न होते हैं। वैसे तो भक्तों के द्वारा श्रद्धा और भक्ति भाव से अर्पित किया गया रूखा-सूखा भोजन भी मां को प्रिय होता है। फिर भी नवरात्रि के नौ दिनों तक आप मां को उनका प्रिय भोग लगाकर प्रसन्न कर सकते हैं।
नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। शैल का मतलब होता है पर्वत, ये पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं जिसके कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। मां शैलपुत्री प्रकृति की देवी हैं इनके पूजन से साधक को सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं। इन्हें भोग में गाय का शुद्ध घी अर्पित करना चाहिए। इससे रोगों से मुक्ति मिलेगी।
मां के दूसरे स्वरूप को ब्रह्मचारिणी कहा जाता है, नवरात्रि के दूसरे दिन इन्हीं की पूजा का विधान है। इनके एक हाथ में कमल तो दूसरे हाथ में जाप की माला है। इनके नाम का अर्थ होता है तप का आचरण करने वाली। इनके नाम के अनुसार ही इनकी पूजा करने से साधक का मन स्थिर होता है। इनको शक्कर, मिश्री का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि इससे घर के सदस्यों की आयु लंबी होती है।
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा अपने माथे पर अर्द्धचंद्र धारण करती हैं। इसी कारण इनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। इनके घंटे की ध्वनि से बुरी शक्तियां दूर होती हैं। ये सिंह पर सवार होती हैं, इनका शरीर स्वर्ण के समान चमकीला है। इनको खीर का भोग लगाना चाहिए। साथ ही सेब और लाल रंग के पुष्प अर्पित करने चाहिए। मां का यह स्वरूप दुष्टों का संहार करने वाला है।
नवरात्रि के चौथे दिन मां के चौथे स्वरूप कूष्मांडा माता की पूजा कि जाती है। मां कुष्मांडा के चेहरे पर मंद मुस्कान रहती है। इनका यह स्वरूप बहुत मनमोहक लगता है। जब चारों ओर अंधकार व्याप्त था तब इन्होंने ही अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसलिए इनका नाम कूष्मांडा पड़ा। मां कूष्मांडा को किसी भी चीज का भोग लगाने से सहज ही प्रसन्न हो जाती हैं लेकिन इनका प्रिय भोग मालपुआ है।
नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंद माता को मां आदिशक्ति का पांचवा स्वरूप माना गया है। इनकी चार भुजाएं हैं दायीं ओर की ऊपर वाली भुजा में मां ने स्कंद (कुमार कार्तिकेय) को अपनी गोद में लिए हुए हैं, तो वहीं मां के बांयी ओर के ऊपर वाले हाथ में कमल है। बायीं ओर के ऊपर वाला हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। तो नीचे की तरफ के हाथ में भी मां ने कमल धारण किया हुआ है। स्कंद माता को भोग में केला अर्पित करना चाहिए।
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। मां आदिशक्ति ने कात्यायन ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर इनके यहां कन्या के रूप में जन्म लिया था। जिसके कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। इनकी साधना से साधक को इस लोक में रहकर भी आलौकिक तेज की प्राप्ति होती है। इन्हें शहद का भोग लगाना चाहिए।
मां कालरात्रि आदिशक्ति का सांतवा स्वरुप हैं। इनका स्वरुप देखने में रौद्र है, क्योंकि यह राक्षसों और दुष्टों का संहार करती है। इनका यह स्वरूप दुष्टों में भय उत्पन्न करने वाला है लेकिन भक्तों के लिए इनका यह स्वरुप हमेशा शुभफलदायी है। इसलिए इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। मां कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाना चाहिए।
नवरात्रि के आंठवे दिन मां महागौरी की पूजा करने का विधान है। इन्हें अन्नपूर्णा भी कहते हैं। ये गौर वर्ण की हैं। जिसके कारण इन्हें गौरी कहा जाता है। इनकी पूजा में भोग स्वरूप नारियल अर्पित करना चाहिए।
मां सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्रि के नवम दिन की जाती है। इनकी कृपा से साधक को हर कार्य में सिद्धि प्राप्त होती है। स्वयं शिव जी ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियां प्राप्त की थी। ये शिव जी के बाएं अंग में विराजती हैं जिसके कारण ही शिव जी को अर्द्धनारीश्वर कहा जाता है। मां सिद्धिदात्री को नारियल और खीर का भोग लगाना चाहिए।
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