पितृपक्ष 2 सितंबर से, पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करना ही श्राद्ध है

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वेद और पुराणों में इसे बताया गया है पुण्यकर्म

समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। इस वर्ष 16 दिन के श्राद्ध होंगे। श्राद्ध 2 सितंबर को पूर्णिमा से शुरू होंगे। 16 दिन बाद 17 सितंबर को सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या पर श्राद्ध का समापन होगा।
हिंदुओं में श्राद्ध पक्ष पितरों का सबसे पड़ा पर्व माना जाता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक यह 16 दिन का होता है लेकिन तिथियां घटने-बढ़ने के साथ इसके दिन कम-ज्यादा होते हैं। ज्योतिषाचार्य पं. रमनकांत पांडेय ने बताया 2 सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध होगा।
तारीख तिथि:
2 सितंबर पूर्णिमा
3 प्रतिपदा
4 सितंबर द्वितीया
5 सितंबर तृतीया
6 सितंबर चतुर्थी
7 सितम्बर पंचमी
8 सितंबर षष्ठी
9 सितंबर सप्तमी
10 सितंबर अष्टमी
11 सितंबर नवमी
12 सितंबर दशमी
13 सितंबर एकादशी
14 सितंबर द्वादशी
15 सितंबर त्रयोदशी
16 सितंबर चतुर्दशी
17 सितंबर अमावस्या
आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या तक की अवधि को पितृपक्ष माना जाता है। वैदिक परंपरा और हिंदू मान्यताओं के अनुसार पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करना पुण्यकर्म है। मान्यता के मुताबिक पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक माना जाता है, जब वह अपने जीवन काल में जीवित माता-पिता की सेवा करे और उनके मरने के बाद उनकी मृत्यु तिथि पर महालय पितृपक्ष में पूरी विधि से श्राद्ध करे।
श्राद्ध का अर्थ है, अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना। पुराणों के अनुसार, मृत्यु के बाद भी जीव की पवित्र आत्माएं किसी न किसी रूप में श्राद्ध पक्ष में अपने परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आती हैं। पितरों के परिजन उनका तर्पण कर उन्हें तृप्त करते हैं। इस बार 2 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं।
भगवान राम ने किया था यहां श्राद्ध
गया जाकर पितरों का श्राद्ध करने से सात पीढ़ियों का उद्धार होता है। माना जाता है कि यहां भगवान विष्णु पितृ देवता के रूप में मौजूद हैं, इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है। पिंडदान को मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग माना जाता है। मान्यता है कि भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।
गयासुर के शरीर से बनी गया
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भस्मासुर के वंश में गयासुर नामक राक्षस ने कठिन तपस्या कर ब्रह्माजी से वरदान मांगा था कि उसका शरीर देवताओं की तरह पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन मात्र से पाप मुक्त हो जाएं। इस वरदान के मिलने के बाद स्वर्ग में अधर्मियों की जनसंख्या बढ़ने लगी। इससे बचने के लिए देवताओं ने गयासुर से यज्ञ के लिए पवित्र स्थल की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया। यज्ञ के बाद जब गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया। यही जगह आगे चलकर गया बनी। गयासुर ने देवताओं से वरदान मांगा कि यह स्थान लोगों को तारने वाला बना रहे। जो भी लोग यहां पर किसी का तर्पण करने की इच्छा से पिंडदान करें, उन्हें मुक्ति मिले। यही कारण है कि आज भी लोग अपने पितरों को तारने के लिए पिंडदान के लिए गया आते हैं।

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