कन्धे से गायब हुआ झोला

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समाचार सच, हल्द्वानी। आधुनिकता की चकाचौंध में यहां के जनजीवन से जुड़ी अनेक परम्पराएं समाप्ति की ओर हैं। कभी खान – पान, पहनावा, रीति-रिवाज आदि परम्पराओं में झोला भी यहां की पहचान से जुड़ा हुआ था। जो वर्तमान परिदृश्य से गायब हो चला है। पहाड़ों में लोग जैसे ही बाजार जाने को होते थे, उनके कन्धे पर झोला लटका हुआ देखा जाता था। जैसे ही किसी ने झोला कन्धे पर डाला तो ऐसा माना जाता था कि वे सौदा पत्ता लेने बाजार जा रहे हैं।
गौरतलब है कि यहां के सामाजिक जीवन में चर्चाओं में रहता था। जैसे ही कोई व्यक्ति बाजार या दुकान का रूख करता था तो वह झोला टांग कर ही निकलता था। अक्सर झोले को लोग दायें कन्धे पर टांगते थे। पुरूष हो या महिलायें दोनों सामान लाने में झोले का प्रयोग करते थे। कुछ लोग तो आज भी झोले का बराबर प्रयोग करते आ रहे हैं। कलकत्ता में रहने वाले मनोरथ भट्ट कहते हैं कि मैं जब भी बाजार जाता हूं, तो वहां सामान ले जाने में झोले का प्रयोग करता हूं वे कहते हैं कि झोले वाले बाबा आ गये। ऐसा ही एक उदाहरण है हल्द्वानी में रहने वाले डॉ. प्रभाव उप्रेती का भी है। वे कहीं भी जाते हैं तो कन्धे में झोला लटकाये हुए मिल जाते हैं। वे कहते हैं कि झोला यहां की संस्कृति से जुड़ा है। इसलिए इस को ले जाने में शर्म कैसी। पहले लोगों में झोले का जो क्रेज था, वह अब अन्य वस्तुओं ने ले लिया है। रंग – बिरंगे पॉलीथीन ने झोले की संस्कृति को लगभग चलन से बाहर कर दिया है। आज के मॉल शॉपिंग वाली संस्कति पॉलीथीन के रंग – बिरंगे थैलियों में सिमटती जा रही है।

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