शीर्ष नेताओं में एका नहीं होने से मुश्किलें बढ़नी तय

समाचार सच, हल्द्वानी (धीरज भट्ट)। उत्तराखंड में कांग्रेस राज्य में दो बार सत्ता में रह चुकी है और दो बार वह सत्ता पाने की दौड़ में भाजपा से पिछड़ गयी। इधर 2017 में कांग्रेस की 11 सीटें आयी और वह अपने न्यूनतम स्कोर पर सिमट गयी। राजनीति के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस की इस हार के पीछे कहीं न कहीं राज्य के शीर्ष नेताओं में आपसी टकराव भी कारण माना गया था। हालाकि कांग्रेसी नेता आपस में भले ही एक होने का दावा करते आये हों लेकिन अन्दरखाने से जो खबरें छन कर आ रही हैं उसमें सब कुछ ठीक नहीं लग रहा है। अभी जबकि 2022 के विधानसभा चुनावों का एक साल रह गया है और इन परिस्थितियों में पार्टी की नैय्या कैसे पार होगी यह समझ से परे है।
ज्ञात हो कि राज्य में पांचवे विधानसभा चुनाव का एक साल बचा है और अन्दरखाने सभी सियासी दलों ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी हैं। कांग्रेस भी इससे अछूती नहीं है लेकिन लगता नहीं है कि कांग्रेस ने पिछले हार से कोई सबक लिया है। इन चार सालों में कांग्रेस के शीर्ष नेता भले ही मंच पर एक नजर आयें लेकिन उनमें एका नहीं दिखी। इसका अन्दाजा उस समय लग जाता है कि जब पार्टी के नेता एक दूसरे के बारे मंे बयानबाजी करते आये हैं। लगता है कि पार्टी ने अभी भी गुटबाजी से सबक नहीं लिया। हालिया हल्द्वानी में हरीश रावत के समर्थकों ने एक होटल में संवावदाता सम्मेलन किया था वहीं शहर में ही होने के बावजूद नेता प्रतिपक्ष और यहां की विधायक डा. इन्दिरा हदयेश ने उक्त कार्यक्रम में प्रतिभाग नहीं किया। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि पार्टी में शीर्ष स्तर के नेताओं में कहीं न कहीं कोई गड़बड़ है। पिछले बीस सालों का रिकार्ड देखें तो कहीं न कहीं पार्टी के आला नेताओं में खींचतान जारी ही रही। पहले विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद एक नेता के समर्थकों ने उन्हें सीएम बनाने को प्रदर्शन किया था। इससे अन्दाजा लग गया था कि जब अभी से ये हाल हैं तो अंजाम क्या होगा। इसके बाद सीएम नारायण दत्त तिवारी वे संगठन के बीच मेल मिलाप कम ही रहा जिसके कारण पार्टी 2007 का विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पायी। इधर आगे के चुनाव में भाजपा से वह एक सीट लेकर आगे रही और सरकार बनाने में भी सफल रही लेकिन खींचातानी यहां भी कम नहीं रही। वहीं 2017 के विधानसभा चुनावों में तो पार्टी का प्रदर्शन अत्यन्त खराब रहा और एक दर्जन से भी नीचे सीटें आयी। खुद सीएम हरीश रावत दोनों सीटों पर चुनाव हार गये।
ज्वलंत मुद्दों को भुनाने में असफल कांग्रेस
हल्द्वानी। राज्य में एक सशक्त विपक्ष की पार्टी की भूमिका निभाने में कांग्रेस असफल रही। राज्य में स्थायी राजधानी, बेरोजगारी, पलायन आदि पर पार्टी आम लोगों को समझााने में कामयाब नहीं हो पा रही है। इसके लिए धरातल पर लड़ने की आवश्यक्ता है। टिवटर पर बयान देकर पहाड़ की लड़ाई कैसे लड़ी जायेगी यह समझ से परे है।
हरदा को मिल सकता है अनुभव का लाभ
हल्द्वानी। उत्तराखंड कांग्रेस में इस समय हरीश रावत की गिनती सर्वाधिक अनुभवी नेताओं में शुमार होता आया है। वे 1980 अल्मोडा से सांसद चुने गये थे। इसके अलावा वह राज्यसभा के सांसद, विधायक व राज्य के सीएम रह चुके हैं। राज्य में वे कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। इसके अलावा वे असम के प्रभारी भी रह चुके हैं।



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