गरीबों का हाल बेहाल, कोरोना से पहले भूखमरी हमें मार देगी…

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समाचार सच, हल्द्वानी। भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए तीन दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश में लॉकडाउन का ऐलान कर दिया गया था। इस लॉकडाउन के दौरान आवश्यक कामों को छोड़कर किसी भी चीज़ के लिए घर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं दी जा रही है। लेकिन रोज कमा कर खाने वाली जनता के पास अगले 21 दिनों तक घर पर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मैंने ऐसे ही लोगों के जीवन में देखकर और उनसे मिलकर ये समझने की कोशिश की है कि आने वाले दिन उनके लिए कैसे हो सकते है।

उत्तराखण्ड राज्य के हल्द्वानी महानगर में एक जगह है जिसे अब्दुल्ला बिल्डिंग के नाम से जाना जाता है। आपको बताते चले कि यहां सामान्य तौर पर इस जगह पर मजदूरों की काफ़ी भीड़-भाड़ रहती है। इस इलाके में घर और बिल्डिंग बनाने वाले ठेकेदार मजदूर लेने आते हैं। लेकिन बीते बुधवार की सुबह जब मैं इस इलाके में पहुंचा तो यहां पसरा हुआ सन्नाटा देखने को मिला। सब कुछ रुका हुआ था। बस पेड़ों की पत्तियां हिल रही थीं। चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। सामान्य तौर पर ये काफ़ी शोर-शराबे वाली जगह है। उस दिन वहां चिड़ियों का शोर सुनना काफ़ी अजीब अनुभव था। लेकिन मैं जब ये आवाज़ें सुन ही रहा था कि तभी मुझे एक कोने में बैठे हुए कुछ लोगों का एक झुंड दिखाई दिया।

मैंने अपनी गाड़ी रोककर उनसे एक सुरक्षित दूरी बनाकर बात करने की कोशिश की। मैंने उनसे पूछा कि क्या वे कर्फ्यू का पालन नहीं कर रहे हैं। मेरे इस सवाल पर उनके चेहरों पर अजीब सी शिकन दिखी। इनमें से एक शख्स राम सिंह तीनपानी का रहने वाला था। राम सिंह ने बताया कि उन्हें पता था कि अब 21 दिनों तक हमें काम देने के लिए कोई नहीं आएगा। लेकिन हमने सोचा कि अपनी किस्मत आजमाने में क्या जाता है। राम सिंह कहते हैं, मैं हर रोज़ 300 सौ रुपये कमाता हूँ। और मुझे घर में 6 लोगों का पेट भरना होता है, मुझे कोरोना वायरस के ख़तरे का पता है लेकिन मैं अपने परिवार को भूखा नहीं देख सकता।

ऐसे ही राम सिंह की तरह भारत में लाखों दिहाड़ी मजदूर ऐसी ही परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने जब राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में संपूर्ण लॉकडाउन का ऐलान किया तो इस घोषणा के बाद राम सिंह जैसे मजदूरों को अगली आमदनी के लिए कम से कम 21 दिन का इंतज़ार करना ही पड़ेगा। इसका परिणाम ये होगा कि कई घरों में खाने-पीने का सामान ख़त्म हो जाएगा।

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भले ही केन्द्र सरकार व राज्य सरकार ने राम सिंह जैसे मजदूरों के खाते में सीधे पैसे डालने की बात कह रही है। पीएम मोदी ने इस महामारी की वजह से परेशान होने वाले दिहाड़ी मजदूरों की भी मदद करने का वादा किया है। लेकिन इन वादों को अमल में लाने के लिए सरकारों को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

इधर हल्द्वानी में रिक्शा चालक नरेश बताते हैं कि उन्होंने बीते चार दिनों में कोई पैसा नहीं कमाया है। वे कहते हैं, मुझे अपने परिवार को ज़िंदा रखने के लिए पैसे कमाने पड़ेंगे। लेकिन मैंने सुना है कि सरकार हमें पैसे देने जा रही है। लेकिन ये कब और कैसे मिलेंगे। इसकी हमें कोई जानकारी नहीं है और नरेश ने बताया कि उनके पास अब इतने पैसे भी नहीं है कि वे सुबह शाम का ही खाना खा सकें।

भारत में ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो सड़क किनारे ठेला लगाकर अपना व्यापार करते हैं। शहर में ठंडा बेचने वाले हरि बताते हैं कि उन्होंने कुछ दिन पहले ही दो लोगों को काम पर रखा था क्योंकि गर्मियां आ रही हैं और गर्मियों में काम बढ़ जाता है। वह कहते हैं, अब मैं उन्हें क्या दे सकता हूँ। मेरे पास खुद पैसे नहीं हैं। मेरा परिवार खेती से पैसे कमाता है। लेकिन परिवार की पूरी खेती ओले गिरने की वजह से नष्ट हो गई। मैं भी असहाय हूं। मुझे लगता है कि हमारे जैसे कई लोगों को भूख कोरोना वायरस से पहले मार देगी।

टूरिज़्म इंडस्ट्री में काम करने वालों का हुआ बुरा हाल
भारत में कोरोना वायरस की वजह से सभी पर्यटन स्थलों को बंद कर दिया गया है। इसकी वजह से उन लोगों का जीवन काफी प्रभावित हुआ हैं जो कि पर्यटन उद्योग के सहारे पैसे कमा रहे थे। नैनीताल में फ़ोटोग्राफ़र के रूप में काम करने वाले संजय नेगी बताते हैं कि उन्होंने अपने धंधे में इतनी मंदी कभी नहीं देखी। वह कहते हैं, कि अब गर्मियों का समय आ रहा है तो भारत के कई राज्यों से नैनीताल घूमने लोग आते पर ंकोरोना बीमारी की वजह से अब वो भी नहीं आएगे। इसके बाद अब मैं कोई और काम भी नहीं कर सकता हूँ। और मैं पूरे टाइम अपने घरवालों के बारे में सोचता रहता हूँ।

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हल्द्वानी से नैनीताल में टैक्सी चलाकर अपनी आमदनी चलाने वालों पर भी इसका काफ़ी बुरा असर पड़ा है। टैक्सी चालक हरीश कहते हैं कि सरकार को उनके जैसे लोगों को कुछ मदद देनी चाहिए। वह बताते हैं, मुझे लॉकडाउन की अहमियत समझ आती है। कोरोना वायरस एक ख़तरनाक बीमारी है। और हमें खुद को इससे बचाकर रखना चाहिए। लेकिन मैं इस बात को लेकर परेशान हूँ कि अगर ये लॉकडाउन निरन्तर चलता रहा तो मैं अपने घरवालों को कैसे खिलाऊंगा-पिलाऊंगा।

वही रोडवेज में पानी की बोतले बेचने वाले मुहम्मद सैफी से हमारी बात हुई उन्होने बताया मुझे कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ पता है और ये बहुत ख़तरनाक बीमारी है जिन लोगों को पास रहने का ठिकाना है, वो घरों के अंदर हैं। हमारे जैसे लोगों के पास दो ही विकल्प हैं – एक सुरक्षा और दूसरा भूख अब आप ही बताएं कि हम किसे चुनें।

अंतरर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक़, भारत में कम से कम 90 फीसदी लोग गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। ये लोग सिक्योरिटी गार्ड, सफाई करने वाले, रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले, कूड़ा उठाने वाले और घरों में नौकर के रूप में काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर लोगों को पेंशन, बीमार होने पर छुट्टी, पेड लीव और किसी भी तरह का बीमा नहीं मिलता है। कई लोगों के बैंक अकाउंट नहीं हैं। ऐसे में इनकी और इनके परिवार की ज़िंदगी उसी नकद आमदनी पर टिकी होती है जिसे ये पूरे दिन काम करने के बाद घर लेकर आते है। इनमें से कई सारे प्रवासी मजदूर हैं। जो कि असल में दूसरे राज्य के निवासी है और ये काम करने कहीं और आए हैं।

इस समस्या को दूर करने के लिए सभी सरकारों को बहुत तेजी से काम करना होगा। क्योंकि स्थिति हर रोज़ बदल रही है। हमें बड़े किचिन बनाने चाहिए जहां पर खाना बनाकर ज़रूरतमंदों तक पहुंचाया जा सके। हमें पैसे, चावल या गेहूं देना चाहिए बिना ये सोचे हुए कि लेने वाला कहां का है। वही कम्युनिटी ट्रांसमिशन से बचने के लिए लोगों को एक शहर से दूसरे शहर में जाने से रोकना होगा। और ऐसा करने का एक ही तरीका है कि इन लोगों के खान-पान की व्यवस्था की जाए। क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में लोग अपने गांवों की ओर भागते हैं। लेकिन हर कोई अपने गांव जाने की सामर्थ्य में नहीं है।

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