बसन्त के आगमन के प्रतीक फूल देई

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फूल देई, छम्मा देई, देणी द्वार, भर भकार…..

समाचार सच, हल्द्वानी। उत्तराखण्ड के देवभूमि के नाम से नवाजा जाता है। इसके अलावा लोग त्यौहार प्रेमी होते है। यहां हर माह में कोई न कोई त्यौहार या पर्व आता है। बसंत ऋतु के आगमन की सूचना देने वाले पर्व को फूल देई के नाम से जाना जाता है।

चैत्र मास की संक्रान्ति को फूलदेई के रुप में मनाया जाता है, जो बसन्त ऋतु के स्वागत का त्यौहार है। इस दिन छोटे बच्चे सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली/फ्यूंली, बुरांस, बासिंग आदि जंगली फूलो के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को चुनकर लाते हैं और एक थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते, नारियल और इन फूलों को सजाकर हर घर की देहरी पर लोकगीतों को गाते हुये जाते हैं और देहरी का पूजन करते हुये गाते हैं-

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फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार…फूल देई-छ्म्मा देई।

इस दिन से लोकगीतों के गायन का अंदाज भी बदल जाता है, होली के फाग की खुमारी में डूबे लोग इस दिन से ऋतुरैंण और चैती गायन में डूबने लगते हैं। ढोल-दमाऊ बजाने वाले लोग जिन्हें बाजगी, औली या ढोली कहा जाता है। वे भी इस दिन गांव के हर घर के आंगन में आकर इन गीतों को गाते हैं। जिसके फलस्वरुप घर के मुखिया द्वारा उनको चावल, आटा या अन्य कोई अनाज और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। बसन्त के आगमन से जहां पूरा पहाड़ बुरांस की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगो से भर जाता है। वहीं चैत्र संक्रान्ति के दिन बच्चों द्वारा प्रकृति को इस अप्रतिम उपहार सौंपने के लिये धन्यवाद अदा करते हैं। इस दिन घरों में विशेष रुप से सई’ बनाकर आपस में बांटा जाता है।

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बच्चें बचपन में इस दिन का इंतजार करते हैं। आस-पास से प्योंली के फूल, भिटोरे के फूल (गेहूं के खेत में उगने वाला एक सफेद रंग का फूल, जिसमें लाल धारियां बनी होती हैं) और सरसों, आडू, पुलम, खुबानी के फूलों को एक थाली में सजाकर अपने घर के आस-पास के घरों में घूमा करते है। जिस घर की देहरी हम पूजते, वहां से पैसे गुड़, चावल और सई खाने को मिलता है।
साभार: मेरा पहाड़ से

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