समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। अहोई अष्टमी व्रत के बारे में क्या आपने कभी सुना है३ अगर नहीं तो आज वेद संसार आपको इसी खास व्रत के बारे में बताने जा रहा है।
दरअसल, अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं अपने संतान की दीर्घायु के लिए रखती हैं। हर साल की तरह इस साल यानि कि 2020 में 8 नवंबर को अहोई अष्टमी का खास व्रत कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन रखा जाएगा। उत्तर भारत में यह पर्व खासकर के मनाया जाता है। महिलाएं इस दिन सच्चे मन से उपवास करती हैं व साथ ही अहोई देवी की पूजा भी करती है। बता दें कि यह शुभ दिन देवी अहोई माता को समर्पित माना जाता है।
अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त और इस व्रत का महत्व पर सबसे पहले जानें कि आखिर कौन है मां अहोई?
अहोई३ अनहोनी शब्द का अपभ्रंश है। अनहोनी को टालने वाली माता देवी पार्वती को माना जाता हैं, इसलिए इस दिन मां पार्वती की पूजा-अर्चना करने का नियम है। अपनी संतानों की दीर्घायु, अच्छी सेहत व किसी भी तरह की अनहोनी से बचाने के लिए हर महिला जो माता बन चुकी है वह व्रत रखती है और साही माता एवं भगवती पार्वती से आशीष मांगती हैं।
अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त
तिथिः 8 नवंबर समय: रविवार की शाम 5 बजकर 26 मिनट से शाम 6 बजकर 46 मिनट तक
अवधि: 1 घंटा 19 मिनट
वहीं, अष्टमी तिथि की शुरुआत 8 नवंबर की सुबह 7 बजकर 28 मिनट से ही हो जाएगी।
साथ ही अष्टमी तिथि की समाप्ति 8 नवंबर की सुबह 6 बजकर 50 मिनट को
अहोई अष्टमी व्रत की पूजा विधि
-सभी माताएं सूर्याेदय से पहले नहा-धो लें और फिर व्रत रखने का संकल्प सच्चे दिल से ले लें।
अब आप अहोई माता की पूजा के लिए दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बना लें।
-यही नहीं, आप सेह और उसके सात पुत्रों का चित्र भी याद से बनाएं।
-ध्यान रहें कि शाम के समय पूजा करने के लिए अहोई माता के चित्र को सामने एक चौकी पर रख दें।
-साथ ही उस पर जल से भरा कलश भी रखें।
-रोली और चावल से माता की पूजा करें।
-भोग में मीठा पुए या आटे के हलवा चढ़ाएं।
-कलश पर स्वास्तिक बनाना ना भूलें और हाथ में गेंहू के सात दाने लेकर अहोई माता की पूरी कथा अच्छे से सुनें।
-इसके बाद तारों को अर्घ्य देकर अपने से बड़ों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें।
अहोई अष्टमी व्रत का क्या है महत्व
ऐसी मान्यता है कि अहोई अष्टमी के दिन व्रत रखने से आपके संतान के कष्टों का निवारण हो जाता है और उनके जीवन में सुख-समृद्धि व तरक्की सभी आती है। कहा तो यह भी जाता है कि जिन माताओं की संतान को शारीरिक कष्ट है या उनके बच्चों का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है और वह बार-बार बीमार पड़ते हैं। साफ शब्दों में कहे तो किसी भी कारण से माता-पिता को अपनी संतान की ओर से चिंता बनी रहती हो तो वह हर माता को विधि-विधान से अहोई माता की पूजा-अर्चना और व्रत करने से संतान को विशेष लाभ पहुंचता है।
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