समाचार सच, हल्द्वानी (हर्षित चौहान)। कोरोना वाइरस के पूरी दुनिया में फैलने के बाद वेंटिलेटर शब्द काफी सुनने को मिल रहा है और वेंटिलेटर को जीवन रक्षक प्रणाली भी कहा जाता है। वेंटिलेटर का इस्तेमाल आमतौर पर तब ही होता है जब मरीज का शरीर साथ छोड़ देता है और खुद से सांस लेने की स्थिति में नहीं रहता है।
चलिए वेंटिलेटर को समझने की कोशिश करते है। मरीज का शरीर जब श्वसन प्रक्रिया करने में असमर्थ रहता है तो इस काम में सहायता वेंटिलेटर करता है। वेंटिलेटर मरीज को इंफेक्शन से लड़ने और ठीक होने में मदद करता हैै। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक कोरोना वाइरस से संक्रमित 80 फीसदी लोग बिना अस्पताल गए ठीक हो गए हैं।
वहीं जबकि प्रत्येक 6 में से 1 व्यक्ति की हालत नाजुक हुई है और उसे सांस लेने में दिक्कत हुई है। ऐसा इसलिए पाया गया कि वाइरस ने फेफड़े को पूरी तरह से बंद कर दिया जिसके कारण शरीर के अंदर आक्सीजन नहीं पहुंच पाया। ऐसे में वेंटिलेटर का उपयोग हवा को धकेलने के लिए किया जाता है, जिससे फेफड़ों में आक्सीजन का स्तर बढ़ जाता है। वेंटिलेटर में हृयूमिडिफायर भी होता हैं, जो हवा में गर्मी और नमी जोड़ता है, इसलिए यह मरीज के शरीर का तापमान सामान्य रहता हैं। वेंटिलेटर में हूड्स होता है, जहां ऑक्सीजन को वाल्व के माध्यम से पंप किया जाता है। कोरोना के मरीजों के इस्तेमाल होता है, ताकि सांस की बूंदों के साथ वाइरस बाहर ना फैले।
135 करोड़ की आबादी पर भारत के पास सिर्फ 40 हजार वेंटिलेटर्स
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में केवल लगभग 8432 वेंटिलेटर हैं। वही चेन्नई स्थित चिकित्सा उपकरण निर्माता ट्रिवट्रॉन हेल्थकेयर का कहना है कि देश भर में लगभग 40000 वेंटिलेटर हैं जो कि ज्यादातर निजी क्षेत्र में है। वही त्रिपिट्रॉन हेल्थकेयर के अध्यक्ष सुदीप बागची ने जानकारी दी कि इनमें से अकेले मुंबई में 800 से 1000 वेंटिलेटर है वही तमिलनाडु और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में इनकी संख्या क्रमश: 1500 और 1800 हैं। बंगलुरू शहर में लगभग 400 ही वेंटिलेटर है, जबकि केरल में 5000 है।
कई विशेषज्ञों का मानना हैं कि अस्पतालों में जॉंच केन्द्रों की संख्या कोरोना के मरीजों को उपचार दिलाने के लिए अपर्याप्त हो सकती है। भारत में कितने वेंटिलेटर्स की जरूरत पड़ सकती है इसका गणित हैदराबाद के सीथरा एडेप्ट टेक्नोलॉजीज के संस्थापक जुडिश राज ने बताया कि कोरोना जैसी महामारी को नियंत्रण करने के लिए देश को 80 से 100 गुना वेंटिलेटर्स की जरूरत पड़ेगी। यदि इसका हिसाब लगाया जाए तो भारत को करीब 40 लाख वेंटिलेटर्स की जरूरत है।
वेंटिलेटर्स की क्या कीमत ?
कोरोना वाइरस से निपटने के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ;क्त्क्व्द्ध ने तैयारी शुरू कर दी है। डीआरडीओ के चेयरमैन जी. सतीश रेड्डी ने बताया कि हमने 10-15 दिन में 20 हजार सेनेटाइजर की यूनिट बनाई है। इसके साथ करीब 35 हजार मास्क बनाए है। उन्होनें ने बताया कि एक हफ्ते में वेंटिलेटर की आपूर्ति हो जाएगी।
साथ ही रेड्डी ने बताया कि वेंटिलेटर के कुछ पार्ट्स को लेकर अभी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हैं। अगले महिने के अंदर 10 हजार वेंटिलेटर बना लेगे। हम महिंद्रा और अन्य कंपनियों को प्रौद्योगिकी देगे। वही पिछले कुछ दिनों में हमारे सांइटिस्ट द्वारा एक ऐसा वेंटिलेटर विकसित किया गया है जिसका उपयोग 4 से 8 मरीज कर सकते है और दो महिने में 30 हजार वेंटिलेटर की आपूर्ति हमारे द्वारा की जाएगी।
एजीवीए हेल्थकेयर कंपनी जो कि चिकित्सा संबंधी मशीनों को बनाती है उनके मुताबिक कंपनी अगले 30 दिनों में 20000 वेंटिलेटर्स तैयार करने वाली है। वहीं सरकार की तरफ से भी कंपनी को 15 अप्रैल तक 5000 वेंटिलेटर्स देने को आर्डर मिला है। कंपनी के मुताबिक वेंटिलेटर्स की शुरूआती कीमत 1.5 लाख रूपये है, जबकि अधिकतम कीमत 5 लाख तक है।
अभी तक चीन समेत विश्व में कोरोना के जो मरीज मिले है उनमें से 5 प्रतिशत को संास लेने से जुड़ी गंभीर समस्याएं होती है, जिस कारण उनका इलाज वेंटिलेटर में ही किया जा सकता है। वही भारत में हर दिन कोरोना से संक्रमित मामले सामने आते जा रहे है, विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ते मामले इस तरफ संकेत दे रहे है कि देश में कोरोना का संक्रमण तीसरे चरण पर पहुंच रहा है। गौरतलब है कि वेंटिलेटर बनाने के लिए सरकार को मोटा बजट खर्च करना होगा। जबकि वेंटिलेटर की सुविधा भी केवल बड़े शहरों में ही है और सरकार द्वारा वेंटिलेटरों की संख्या बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण रूप से प्रयास भी किए जा रहेे है।



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