आयुर्वेद अपनाओ विकार मिटाओ

खबर शेयर करें

समाचार सच, स्वास्थ्य डेस्क। सर्वप्रथम सभी सुधी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं मैं आभार व्यक्त करता हूं डॉ० रमेश चन्द्र जोशी सम्पादक श्रीताराप्रसाद दिव्य पंचांग का जिनके मार्ग निर्देशन में प्रतिवर्ष आयुर्वेद के नए-नए वनस्पतियों की जानकारी आपस पाठकों तक पहुंचाया जा रहा है। हम सबका प्रयास है कि प्रकृति द्वारा दी गई दिव्य औषधीय पौधों का ज्ञान आमजन तक पहुंचे।

मित्रों आज के समय में स्वास्थ्य यदि ठीक है तो परिवार का वातावरण शान्तिपूर्वक चलता है यदि परिवार के किसी सदस्य को विकार उत्पन्न हो जाते हैं तो पूरी व्यवस्था डगमगा जाती है। कारण कुछ भी हो सकता है, आकस्मिक दुर्घटना आ का अनियन्त्रित होना, अत्यधिक धूम्रपान, नशा, प्रदूषित जल, प्रदूषित वायु अथवा शरीर में कोई भी रोग उत्पन्न होना। हाला एलोपैथी में समस्त रोगों का निदान है परन्तु हमारे देश की परम्परागत चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद यानी औषधीय महत्व वनस्पतियों के उपयोगी भाग का प्रयोग करने से विकारों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह कि वनस्पतियों के बारे में जानकारी होनी चाहिए, इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सम्यादक डॉ० रमेश चन्द्र जोशी जी निर्देशन में इन जड़ी बूटियों की जानकारी आप लोगों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूँ। आशा है कि पाठक इसका लाभ सकेंगे। विगत वर्षों में प्रकाशित वनस्पतियों के बारे में अनेकों पाठकों द्वारा मुझसे दूरभाष पर सम्पर्क भी किया, जिसका मेरे द्वा निराकरण भी किया गया।

अमरबेल- यह एक परजीवी सूक्ष्म लता है जो पीला रंग लिए हुए किसी पेड़ पर पीत धागे की तरह दिखाई देता है। इस लन का वानस्पतिक नाम ष्कसकुटारिफ्लेक्सा है। इसे आकाश बेल के नाम से भी जानते हैं। त्वचा रोग, योनि विकार, उदरशूल लाभप्रद है। किसी भी प्रकार का मस्सा हो उसे अमरबेल लपेटकर बांधने से मस्सा कट/मिर जाता है। शिशुओं की भुजा में इस बे को बांधने से बालरोग दूर हो जाते हैं। ज्वर में यदि अमरबेल का चूर्ण लिया जाए तो बुखार में लाभ होता है।

यह भी पढ़ें -   २३ फरवरी २०२६ सोमवार का पंचांग, जानिए राशिफल में आज का दिन आपका कैसा रहेगा

अम्लतास- यह एक मध्यम आकार की वृक्ष प्रजाति है। इसकः वानस्पतिक नाम ‘कैसिफिस्टुला’ है। यह पौधा अपने पीन गुणों से भरपूर हैं। पित्तविकार, जलन, रक्तपित्त, पक्षाघात से ग्रसित रोगी को नियमित रूप से इसके पत्तों का रस पिलाने से ला होता है।

पाषाणद- इसे सिलफोड़ी भी कहा जाता है। इस पौधे का वानस्पतिक नाम ‘बर्जेनियासिलिएटा’ है। यह पर्वतीय क्षेत्रों नमी वाले क्षेत्रों में उगता है। खासकर बरसात के समय चट्टानों में उगता है। चौड़े पत्ते और गुलाबी रंग के फूल से सुशोभित या शाकीय पौधा है। कहीं पर इसे पत्थरफोडी भी कहते हैं, चूंकि इसकी जड़ पथरी के लिए महत्वपूर्ण औषर्थी है लेकिन जड़ क जमीन से निकालना कठिन होता है क्योंकि यह पत्थरों वाले क्षेत्रों में होती है। कुछ लोग इसके पत्तों की सब्जी अथवा पकौड़ बनाकर भी खाते हैं।

बला- बला एक भूमि पर स्वतः उगने वाली छोटी वनस्पति हैं। इस पौधे का वानस्पतिक नाम साइजकार्डिफोलिआ है हैं। इसका पंचांग लाभकारी है। गलगण्ड स्वरभेद, खांसी, अतिसार, प्रदर, रक्त प्रदर, गठिया, प्रसूता, दर्द में लाभ होता है। इसवेल जड़ को सुखाकर चूर्ण बनाकर प्रयोग किया जाता है।

पिपली- पिपली, पिप्पली, कृष्णा, पीपल, चपला आदि नामों से जानी जाती है। यह एक शाकीय पौधा है, जो ऊष्ण क्षेत्रों के वनों में पाया जाता है। इस पौधे का वानस्पतिक नाम ष्पाइपर लौंग्मष् है। पीपली मसाले में प्रयुक्त होने वाला फल है। पके हुए फल को सुखाकर खांसी, दमा, रतौंधी, दंतशूल, हिचकी, अजीर्ण जैसे विकारों में लाभदायक है। फल् के अतिरिक्त पौधे की जड़ भी चूर्ण बनाकर प्रयोग करने से अनेक प्रकार के उदर रोगों में लाभ पहुंचता है। ज्वर में पीपली के सूखे फल को कूटकर शहद के साथ लेने से लाभ होता है। श्वांस रोगों में पीपली का काढ़ा पीने से भी फायदा होता है।

यह भी पढ़ें -   मॉल के बाहर दिनदहाड़े गैंगस्टर मर्डरः पेमेंट की एक क्लिक से खुला राज, जमशेदपुर से आरोपी दबोचा

तगर- तगर जिसे सुगन्धबाला, जटामांसी, तगरमूल आदि नाम से जाना जाता है यह भी एक शाकीय पौधा है, जो हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है। इस पौधे का वानस्पतिक नाम ष्वलेरिऐना जटामांसीष् है। खांसी, श्वास, कृमिरोग, दंतरोग, सूत्ररोग, सफेद दाग में लाभप्रद है। इस वनस्पति के उपयोगी भाग जड़ एवं प्रकन्द हैं। पुराने घावों में इसकी जड़ को पीसकर लेप लगाने से लाभ होता है।

शहतूत- इसे किम, तृत, तुंतरी आदि नामों से भी जाना जाता है। शहतूत का वानस्पतिक नाम् ष्मोरस एल्बाष् है। इसे से रेशम बनाया जाता है। ये पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है। मुंह के छाले, पेट के कीड़े, पेट रोग, जलन, पित्त रोग, दुर्बलता जैसे विकारों में लाभकारी है। इसकी छाल, पत्ते, फल सभी उपयोगी हैं।

दधी- यह भूमि पर स्वतः उगने वाली वनस्पति है। जो वर्षाकाल एवं शीतकाल में काफी मात्रा में उगती है। इस पौधे का वानस्पतिक नाम ‘युफोर्बिया थाइमीफोलिय’ है। इसके तने से दूध निकलता है, इसकी अनेकों जातियां हैं। मुख्य रूप से गंजापन, नासा विकार, छाती रोग, पेट रोग, त्वचा रोग, श्वेत प्रदर, रक्त प्रदर, अतिसार में लाभदायक है, इसका पंचांग प्रयोग में लाया जाता है।

श्री मदन सिंह बिष्ट (सेवानिवृत्त रेंजर), सांई सदन, गली नम्बर ०५, जय विहार, लोहरियासाल मल्ला ऊँचापुल, हल्द्वानी (नैनीताल) उत्तराखण्ड मो० 9412958527। 40 वर्ष वन विभाग की सेवा के उपरान्त दिसम्बर 2024 को सेवानिवृत्त, वर्तमान में ग्रोमोर नर्सरी का संचालन, श्री आनन्द वृद्धाश्रम संस्था में उपाध्यक्ष है। पर्यावरण संरक्षण एवं वनस्पतियों को जन-जन तक प्रचारित करने का कार्य जारी है। ज्योतिष के संरक्षण में भी आपको विशेष योगदान है।

Ad AdAd Ad Ad Ad AdAd Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad

सबसे पहले ख़बरें पाने के लिए -

👉 हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें

👉 फेसबुक पर जुड़ने हेतु पेज़ लाइक करें

👉 यूट्यूब चैनल सबस्क्राइब करें

हमसे संपर्क करने/विज्ञापन देने हेतु संपर्क करें - +91 70170 85440