दो बार वीर चक्र से सम्मानित हुआ था उत्तराखंड का ये लाल…

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समाचार सच, हल्द्वानी। मोहल्ला शेखाखोला अल्मोड़ा के स्वर्गीय श्री जमुना दत्त जोशी व स्वर्गीय श्रीमती मनोहरी देवी के दूसरे पुत्र सतीश चंद्र ने अगस्त 1946 सेंट्रल इंडिया हॉर्स में कमीशन प्राप्त किया।

पहला वीर चक्र:

1948 के भारत-पाक युद्ध में अपनी जान की परवाह ना करते हुए इन्होंने दो घायल सैनिकों की जान बचाई। इस साहसिक कार्य व वीरता के लिए इन्हें तत्कालीन सीएनसी जनरल करिअप्पा द्वारा वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

उन्होंने भारतीय रक्षा अकादमी में भी एक कुशल प्रशिक्षक के रूप में कार्य किया।

दूसरा वीर चक्र:

1965 के भारत-पाक युद्ध में उनकी पलटन को बर्की पर कब्जा करने जा रही सिख रेजीमेंट को मदद करने का आदेश मिला। पाकिस्तान ने अपने बचाव के लिए चारों ओर बारूदी सुरंग बिछाई थी। भारी गोलाबारी के कारण पैदल सेना आगे नहीं बढ़ पा रही थी। लेफ्टिनेंट कर्नल जोशी ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए अपने टैंक को आगे बढ़ाया। लेकिन उनका टैंक बारूदी सुरंग से क्षतिग्रस्त हो गया। वे अपने टैंक से उतरे और पैदल ही बर्की की ओर चल दिए। कुछ दूर चल कर उन्होंने एक जीप ली और हमलावर दस्ते के आगे बढ़ने का रास्ता ढूंढ निकाला। अपने कमांडर के साहस से प्रेरित होकर उनके टैंक आग के गोले बरसाते हुए आगे बढ़े। हमलावर दस्ते की पूरी मदद की और ऑपरेशन सफल रहा। लेकिन इस कार्रवाई के दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल सतीश जोशी की जीप बारूदी सुरंग की चपेट में आ गई और बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई जिसमें कर्नल जोशी बुरी तरह घायल हो गए। भारत मां के इस वीर सपूत ने 12 अगस्त 1965 को अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। बर्की युद्ध में अदम्य साहस कुशल नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत पुनः वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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मेजर बी एस रौतेला ने बताया कि वर्तमान में उनकी पत्नी श्रीमती उमा जोशी निलियम कॉलोनी हल्द्वानी में अपने छोटे भाई के साथ रहती हैं। वे कहती हैं कि उन्हें अपनी अपने पति की शहादत पर गर्व है। मेरा सिंदूर उजड़ गया लेकिन उन्होंने कितनी महिलाओं का सिंदूर बचाया, कितनी माताओं की ममता को जीवित रखा और कितनी बहनों की राखी को सुरक्षित रखा।

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समाचार सच परिवार शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल सतीश चंद्र जोशी की शहादत को सलाम करता है और उनको नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

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