
समाचार सच, हल्द्वानी। उत्तराखण्ड राज्य श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व सादगी व श्रद्धा के साथ मनाया गया। वर्तमान में चल रहे कोरोना महामारी के कारण श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व सादगी के साथ मनाया गया। जिसमें सभी श्रद्धालु मास्क पहनकर आएं इसका पूरा ध्यान रखा गया। सेवादारों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, साथ ही निजी सुरक्षा गार्ड को भी मुख्य द्वार पर नियुक्त किया गया था। जिन्होंने सभी से सरकारी दिशा निर्देशों का पालन करवाया रहे थे। कोरोना महामारी के कारण सेवा दल द्वारा कोई झांकी प्रदर्शित नहीं की गई। मात्र पालने में विराजमान राधे कृष्ण जी सभी को आकर्षित करती रही।
मंदिर में व्रत एवं पूजन का पर्व आज ही मनाया गया। प्रातः से ही मंदिर में विराजमान भगवान श्री राधे कृष्ण जी की प्रतिमाओं के वस्त्र बदले गए। उनका पुष्प एवं पुष्प माला से श्रृंगार किया गया। सभी श्रद्धालुओं को फल व सूखे धनिया पंचामृत का प्रसाद वितरित किया गया। रात्रि के 12.00 बजते ही मंदिर में हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की संकीर्तन होने लगा। शंख बजने लगे, घंटे घड़ियाल बजने लगे और इसी समय श्री लड्डू गोपाल जी का पवित्र गंगा जल, दूध, दही, घी, मधु, पंचामृत इत्यादि से वैदिक मंत्रोचार के साथ महा अभिषेक किया गया। इसके पश्चात उनको सुंदर वस्त्र अर्पण किए गए तथा उन्हें सुंदर सजे पालने में विराजमान किया गया। अंत में आरती के पश्चात माखन मिश्री का विशेष प्रसाद और अन्य प्रसाद वितरित किया गया। कई जगहों पर भक्तों व महिलाओं की टीम द्वारा भजन कीर्तन कर नंदोत्सव मनाया जाएगा।
हल्द्वानी नगर के विभिन्न मंदिर श्री कालू सिद्ध मन्दिर, श्री आँवलेश्वर महादेव मंदिर, प्रचीन श्री राममंदिर, पिपलेश्वर महादेव मंदिर, विष्णुपुरी दुर्गा मंदिर, श्री सत्यनारायण मंदिर, शिव मंदिर, भैरव मंदिर, वैष्णों देवी मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर, लटुरिया आश्रम, राधा कृष्ण मंदिर, खाटू श्याम मंदिर, प्रचीन देवी मंदिर, चारधाम मंदिर सहित आदि मंदिरों कोविड-19 की गाइडलाइन के तहत सादगी से श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर पूजा-अर्चना की गयी। भक्तों ने सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुए विभिन्न मंदिरों में भगवानों के दर्शन व पूजा अर्चना की।
ज्ञात हो कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार भाद्रपद महीने की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। कृष्णजन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्सव है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद्गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी को भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में जन्म लिया। इसलिये भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, अतः इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। जन्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है। स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि द्वापरयुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्य पुराण का वचन है- भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ‘जयंती’ नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए। विष्णुरहस्यादि वचन से- कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नामवाली ही कही जाएगी। वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए। मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। भृगु ने कहा है- जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अन्त में पारणा करें। इसमें केवल रोहिणी उपवास भी सिद्ध है। अन्त्य की दोनों में परा ही लें। श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्तिहटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे। व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमीके दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बड़े हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासीउसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रोंसे मंगलध्वनिबजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव निरूसंदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।

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