महालयारम्भ

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महालयारम्भ का अर्थ है महालय (पितृ पक्ष) की शुरुआत होना। हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि (या भाद्रपद पूर्णिमा) से जब पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) का प्रारंभ होता है, तो शास्त्रों में उसे ही श्महालयारम्भश् कहा जाता है।इसे दो अलग-अलग संदर्भों और चरणों में समझा जाता है-

  1. पितृ पक्ष की शुरुआत (महालयारम्भ)पूर्वजों का स्मरणरू इस दिन से हिंदू धर्म में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण, और श्राद्ध कर्म शुरू करते हैं।
    अवधि: यह सिलसिला पूरे 15-16 दिनों तक चलता है और ‘महालया अमावस्या’ (सर्वपितृ अमावस्या) के दिन समाप्त होता है।
  2. महालया अमावस्या (दुर्गा पूजा की शुरुआत) ‘महालयारम्भ’ शब्द का एक दूसरा सिरा ‘महालया अमावस्या’ से भी जुड़ता है, जिसे विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत में बेहद पवित्र माना जाता है।
    मां दुर्गा का पृथ्वी पर आगमन- मान्यता है कि इसी दिन महालया के शुभ अवसर पर मां दुर्गा कैलाश पर्वत छोड़कर पृथ्वी पर आती हैं।
    देवी पक्ष की शुरुआत – महालया अमावस्या की सुबह पितरों को विदा किया जाता है और उसी शाम से ‘देवी पक्ष’ की शुरुआत हो जाती है, जो शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा के आने का प्रतीक है।
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चक्षु दान- इसी दिन मूर्तिकार मां दुर्गा की प्रतिमा की आँखें तैयार करते हैं (जिसे ‘चक्षु दान’ कहा जाता है), जिसके बाद मूर्तियों को अंतिम रूप दिया जाता है।संक्षेप में कहें तो, महालयारम्भ वह पवित्र समय है जो हमें एक तरफ अपने पूर्वजों (पितरों) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है और दूसरी तरफ जगतजननी मां दुर्गा के स्वागत की तैयारी की याद दिलाता है।

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