आषाढ़ महीने सूर्य देव को अर्घ्य देना, तांबे और गेहूं का दान करना तथा भगवान वामन की पूजा करना विशेष फलदायी

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। 30 जून से आषाढ़ मास की शुरुआत हो रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पूरे महीने सूर्य देव को अर्घ्य देना, तांबे और गेहूं का दान करना तथा भगवान वामन की पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है। ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार यह महीना आध्यात्मिक साधना के साथ मौसम परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतने का भी समय माना जाता है।

आषाढ़ में सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व
आषाढ़ महीना 30 जून से 29 जुलाई तक रहेगा। इस महीने उगते हुए सूरज को अर्घ्य देने की परंपरा है। आषाढ़ के दौरान सूर्य अपने मित्र ग्रहों की राशि में रहता है। इससे सूर्य का शुभ प्रभाव और बढ़ जाता है। स्कंद पुराण के मुताबिक आषाढ़ महीने में भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करनी चाहिए। क्योंकि इस महीने के देवता भगवान वामन ही हैं। इसलिए आषाढ़ महीने के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि पर भगवान वामन की विशेष पूजा और व्रत की परंपरा है।

वामन पुराण के मुताबिक आषाढ़ महीने के दौरान भगवान विष्णु के इस अवतार की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। संतान सुख मिलता है, जाने-अनजाने में हुए पाप और शारीरिक परेशानियां भी खत्म हो जाती हैं। आषाढ़ महीना धर्म-कर्म के अलावा सेहत के नजरिये से भी बहुत खास होता है। आयुर्वेद के प्रमुख आचार्य चरक, सुश्रुत और वागभट्ट ने इस महीने को ऋतुओं का संधिकाल कहा है। यानी ये मौसम परिवर्तन का समय होता है। इस दौरान गर्मी खत्म होती है और बारिश की शुरुआत होती है। ज्योतिषियों के मुताबिक आषाढ़ महीने में सूर्य मिथुन राशि में रहता है। इस कारण भी रोगों का संक्रमण बढ़ता है।

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सूर्य को देना चाहिए अर्घ्य
सुबह सूर्याेदय से पहले उठकर तीर्थ स्नान करें। यदि संभव न हो तो घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर नहाएं। इसके बाद भगवान सूर्य को जल चढ़ाएं। इसके लिए तांबे के लोटे में जल भरें और चावल, फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। जल चढ़ाते समय सूर्य के वरुण रूप को प्रणाम करते हुए ऊं रवये नमरू मंत्र का जाप करें। इस जाप के साथ शक्ति, बुद्धि, स्वास्थ्य और सम्मान की कामना करना चाहिए।

इस प्रकार जल चढ़ाने के बाद धूप, दीप से सूर्य देव का पूजन करें। सूर्य से संबंधित चीजें जैसे तांबे का बर्तन, पीले या लाल कपड़े, गेहूं, गुड़, लाल चंदन का दान करें। श्रद्धानुसार इन में से किसी भी चीज का दान किया जा सकता है। इस दिन सूर्यदेव की पूजा के बाद एक समय फलाहार करें।

भगवान वामन की पूजा का विधान
डा. अनीष व्यास ने बताया कि आषाढ़ महीने के गुरुवार को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन व्रत और पूजा के बाद छोटे बच्चे को भगवान वामन का रूप मानकर भोजन करवाया जाता है और जरूरत की चीजों का दान भी किया जाता है। साथ ही इस महीने की दोनों एकादशी तिथियों पर भगवान वामन की पूजा के बाद अन्न और जल का दान किया जाता है।

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वामन अवतार की कथा
सतयुग में असुर बलि ने देवताओं को पराजित करके स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया था। इसके बाद सभी देवता भगवान विष्णु से मदद मांगने पहुंचे। तब विष्णुजी ने देवमाता अदिति के गर्भ से वामन रूप में अवतार लिया। इसके बाद एक दिन राजा बलि यज्ञ कर रहा था, तब वामनदेव बलि के पास गए और तीन पग धरती दान में मांगी।

शुक्राचार्य के मना करने के बाद भी राजा बलि ने वामनदेव को तीन पग धरती दान में देने का वचन दे दिया। इसके बाद वामनदेव ने विशाल रूप धारण किया और एक पग में धरती और दूसरे पग में स्वर्गलोक नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने वामन को खुद सिर पर पग रखने को कहा। वामनदेव ने जैसे ही बलि के सिर पर चरण रखा, वह पाताल लोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे पाताललोक का स्वामी बना दिया और सभी देवताओं को उनका स्वर्ग लौटा दिया। (साभार: ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास)

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