समाचार सच, जानकारी डेस्क। प्रतिवर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद (1863-1902 ईसवीं) के जन्म दिवस पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद को देश, धर्म और समाज के लिए उनके द्वारा किए गए योगदान के लिए जाना जाता है। सबसे पहले उन्होंने ही देश के धर्म और संस्कृति को वैश्घ्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाई थी। आओ जानते हैं उनके संबंध में 25 दिलचस्प जानकारी। स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व इतना विराट था कि उनसे जुड़ी हर बात प्रेरणा देती है। यहाँ उनके जीवन से जुड़ी 25 दिलचस्प और कम ज्ञात जानकारियां दी गई हैं। स्वामी विवेकानन्द की 163वां जन्म वर्षगांठ मनाई जा रही है।
बचपन का नाम
स्वामी विवेकानंद का जन्म गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट, कोलकाता (कलकत्ता) में हुआ था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त (कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील) ने उनका नाम नाम नरेंद्रनाथ रखा था, लेकिन उनकी माता भुवनेश्वरी देवी उन्हें प्यार से ‘वीरेश्वर’ कहकर बुलाती थीं।
कुशाग्र बुद्धि
उनकी याददाश्त इतनी तेज थी कि वे एक बार किताब पढ़कर उसका पन्ना-पन्ना याद कर लेते थे। एक लाइब्रेरियन ने उनका टेस्ट लिया तो वे दंग रह गए क्योंकि स्वामी जी ने पूरी किताब के अंश सुना दिए थे।
औसत छात्र
जानकर हैरानी होगी कि इतनी प्रतिभा के बावजूद वे परीक्षा में औसत अंक लाते थे। उन्हें ग्रेजुएशन में केवल 56ः अंक मिले थे।
बेरोजगारी का दौर
पिता की मृत्यु के बाद उनका परिवार बेहद गरीबी में था। वे नौकरी के लिए दर-दर भटके लेकिन असफल रहे, उस समय उन्होंने कहा था- बेरोजगार हूँ।
भूखे रहने का त्याग
गरीबी के दिनों में वे अक्सर घर पर झूठ बोल देते थे कि उन्हें किसी ने खाने पर बुलाया है, ताकि उनके हिस्से का खाना परिवार के अन्य सदस्य खा सकें।
गुरु से पहला सवाल
जब वे रामकृष्ण परमहंस से मिले, तो उन्होंने सीधे पूछाकृ ष्क्या आपने ईश्वर को देखा है?ष् गुरु ने उत्तर दियाकृ ष्हाँ, जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ।
सन्यास
उन्होंने मात्र 25 वर्ष की आयु में सन्यास ले लिया और पूरे भारत की पैदल यात्रा की।
नाम का रहस्य
विवेकानंद नाम उन्हें खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह ने दिया था। पहले उन्हें ‘विविदिषानंद’ के नाम से जाना जाता था।
मठ के सख्त नियम
उन्होंने बेलूर मठ में महिलाओं का प्रवेश वर्जित किया था। यहाँ तक कि एक बार अपनी माता के आने पर भी वे क्रोधित हुए थे क्योंकि वे अपने बनाए नियमों के प्रति बहुत पक्के थे।
ऐतिहासिक शुरुआत
1893 के विश्व धर्म संसद में उन्होंने अपना भाषण ष्मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनोंष् से शुरू किया, जिसके बाद 2 मिनट तक तालियाँ बजती रहीं।
समय की कमी
उन्हें बोलने के लिए सिर्फ 2 मिनट दिए गए थे, लेकिन उनके ज्ञान को देखकर बाद में उन्हें घंटों सुना गया।
साइक्लोनिक हिंदू
अमेरिकी मीडिया ने उनकी ओजस्वी वक्तृत्व शैली के कारण उन्हें श्साइक्लोनिक हिंदूश् का नाम दिया था।
विदेशी शिष्या
मार्गरेट नोबल (भगिनी निवेदिता) उनकी सबसे प्रमुख शिष्या बनीं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारत की सेवा में लगा दिया।
चाय के शौकीन
स्वामी जी को चाय बहुत पसंद थी। उन्होंने उस समय मठ में चाय की शुरुआत की जब अन्य पंडित इसका विरोध करते थे।
मसालेदार चाय
उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को मठ में मसालेदार चाय बनाने के लिए प्रेरित किया था।
फोकस की शक्ति
अमेरिका में उन्होंने पुल पर तैरते अंडे के छिलकों पर 12 सटीक निशाने लगाए, जबकि वे पहली बार बंदूक चला रहे थे। उन्होंने कहा- ‘जो भी करो, पूरे ध्यान से करो।’
पशु प्रेमी
उन्हें जानवरों से बहुत लगाव था। उनके पास एक पालतू कुत्ता, एक बकरी (हंसु) और कई पक्षी थे।
सादा जीवन
विदेश में जब लोगों ने उनके कपड़ों का मजाक उड़ाया, तो उन्होंने कहाकृ ष्तुम्हारे देश में दर्जी इंसान बनाता है, मेरे देश में चरित्र इंसान बनाता है।ष्
बीमारियों से संघर्ष
ऐसा कहते हैं कि उनके शरीर में 31 से अधिक बीमारियां थीं, जिनमें मधुमेह, अस्थमा और अनिद्रा प्रमुख थीं।
मृत्यु की भविष्यवाणी
उन्होंने पहले ही कह दिया था कि वे 40 वर्ष की आयु पार नहीं करेंगे।
महापरिनिर्वाण
4जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में ध्यान की अवस्था में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
अंतिम भोजन
अपनी मृत्यु वाले दिन उन्होंने अपने शिष्यों के साथ बैठकर अपनी पसंदीदा खिचड़ी खाई थी।
डर का सामना
बनारस में जब बंदरों ने उन्हें घेरा, तो वे भागे नहीं बल्कि पलटकर उनका सामना किया और बंदर भाग गए। यही सीख उन्होंने जीवन में भी दी।
खेतड़ी के राजा की मदद
महाराजा अजीत सिंह स्वामी जी की माता को हर महीने 100 रुपये भेजते थे ताकि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक रहे।
राष्ट्रीय युवा दिवस
उनकी जयंती (12 जनवरी) को पूरे भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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