समाचार सच, उत्तराखण्ड। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में गर्मी ने समय से पहले ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। तेज धूप और लू जैसे हालात लोगों के लिए परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। तापमान में लगातार वृद्धि के साथ ही प्रदेश में पेयजल की मांग भी तेजी से बढ़ रही है, जिससे आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव साफ दिखाई देने लगा है।
उत्तर भारत के अन्य हिस्सों की तरह उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में भी गर्मी का प्रभाव स्पष्ट नजर आने लगा है। जहां पहाड़ी क्षेत्रों में अभी भी मौसम कुछ हद तक राहत भरा है, वहीं देहरादून सहित मैदानी जिलों में दोपहर की धूप असहनीय होती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि लोग जरूरी काम होने पर ही घर से बाहर निकल रहे हैं। दोपहर के समय सड़कों पर भीड़ कम दिखती है, जबकि सुबह और शाम के समय आवाजाही बढ़ जाती है।
तेज धूप और गर्म हवाओं से बचाव के लिए लोग छाता, टोपी और पानी की बोतल का सहारा ले रहे हैं। कई लोगों ने अपने कामकाज का समय भी बदल दिया है ताकि दोपहर की तपिश से बचा जा सके। रात के समय भी तापमान में खास गिरावट नहीं होने से राहत नहीं मिल पा रही है। इसी कारण कूलर और एसी का उपयोग बढ़ गया है, जिससे बिजली की खपत में भी इजाफा हो रहा है।
कुछ दिन पहले तक तापमान सामान्य बना हुआ था, लेकिन अब इसमें लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। देहरादून में हाल ही में अधिकतम तापमान 35 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया, जो इस सीजन का अब तक का उच्चतम स्तर माना जा रहा है। तापमान बढ़ने के साथ ही शरीर को अधिक पानी की जरूरत होती है, जिससे प्रति व्यक्ति जल खपत बढ़ जाती है। इसके अलावा घरेलू उपयोग जैसे नहाना, कपड़े धोना और साफ-सफाई में भी पानी की खपत बढ़ जाती है।
गर्मी बढ़ने के साथ जल स्रोतों पर भी दबाव बढ़ जाता है। नदियां, झरने और छोटे जलाशय धीरे-धीरे सूखने लगते हैं या उनका जलस्तर कम हो जाता है। इससे जल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ता है। एक ओर जहां मांग बढ़ती है, वहीं दूसरी ओर आपूर्ति घटती हैकृयही स्थिति हर साल गर्मियों में जल संकट को और गंभीर बना देती है।
यदि पूरे उत्तराखंड की बात करें तो शहरी क्षेत्रों में सामान्य दिनों में करीब 971.91 एमएलडी पानी की मांग रहती है, जबकि उत्पादन लगभग 678.96 एमएलडी ही हो पाता है। यानी सामान्य परिस्थितियों में भी मांग और आपूर्ति के बीच भारी अंतर मौजूद है। गर्मियों में यह अंतर और बढ़ जाता है, जिससे स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
राजधानी देहरादून में सामान्य दिनों में पानी की मांग करीब 288 एमएलडी है, जबकि उत्पादन लगभग 257 एमएलडी तक ही सीमित रहता है। ऐसे में पहले से मौजूद कमी गर्मी बढ़ने के साथ और गहरा जाती है। कई इलाकों में पानी की सप्लाई का समय कम किया जा रहा है, जबकि कुछ जगहों पर आपूर्ति बाधित होने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्मियों में जल संकट से निपटने के लिए जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की जरूरत है। साथ ही लीकेज रोकने, पाइपलाइन सुधारने और जल स्रोतों के संरक्षण पर भी ध्यान देना होगा। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में पेयजल संकट और गंभीर रूप ले सकता है।पेयजल की डिमांड स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। पानी की जरूरत केवल पीने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि घरेलू और दैनिक उपयोग के कारण इसकी खपत कई गुना बढ़ जाती है। शहरी क्षेत्रों में किसी हद तक व्यवस्था को संतुलित किया जा सकता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है. कई गांव ऐसे हैं जहां पेयजल का मुख्य स्रोत प्राकृतिक झरने, नाले या सीमित जलधाराएं होती हैं। गर्मियों के दौरान जब इन स्रोतों का जलस्तर कम हो जाता है या वे सूखने लगते हैं, तो वहां पेयजल संकट गहरा जाता है. ऐसे में लोगों को दूर-दराज के स्रोतों से पानी लाना पड़ता है, जो समय और श्रम दोनों की दृष्टि से कठिन होता है।
मोटर से जलाशयों तक पहुंचाया जाएगा पानीरू पेयजल संकट से निपटने के लिए जल संस्थान और संबंधित विभागों द्वारा कई स्तरों पर काम किया जा रहा है. छोटे-छोटे लेकिन प्रभावी उपायों के जरिए स्थिति को संभालने की कोशिश की जा रही है। हैंडपंपों में मोटर लगाकर पानी की उपलब्धता बढ़ाने की योजना पर काम किया जा रहा है. जिससे कम जलस्तर वाले क्षेत्रों में भी पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इसके अलावा जलाशयों तक पानी पहुंचाने के लिए पंपिंग सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है।
ग्रामीण इलाकों में टैंकर से पानी पहुंचाना हर जगह संभव नहीं होता। ऐसे में स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है। जैसे छोटे जल संग्रहण टैंक, वर्षा जल संचयन और स्रोत संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। विभाग का कहना है कि गर्मियों के दौरान पेयजल आपूर्ति को बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी की जा रही है।



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