समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी कहा जाता है। इस बार कामिका एकादशी का व्रत 9 अगस्त 2026, रविवार को रखा जा रहा है। एकादशी तिथि 9 अगस्त को सुबह 11 बजकर 04 मिनट तक रहेगी, इसके बाद द्वादशी तिथि शुरू होगी। एकादशी व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अगले दिन द्वादशी तिथि में पारण करना चाहिए। 10 अगस्त को सावन का दूसरा सोमवार भी है। ऐसे में इस दिन एकादशी व्रत का पारण करने के बाद श्रद्धालु सावन सोमवार की पूजा कर सकते हैं। इसी दिन त्रयोदशी तिथि शुरू होने के कारण शाम को सोम प्रदोष व्रत का भी संयोग बनेगा।
कामिका एकादशी के पारण को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि व्रत को द्वादशी तिथि में ही खोला जाता है। पारण सूर्याेदय के बाद किया जाता है और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले व्रत खोलने की परंपरा है। अलग-अलग शहरों में सूर्याेदय के समय के कारण पारण के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा क्षेत्र के पंचांग में 10 अगस्त को पारण का समय सुबह 5 बजकर 36 मिनट से 8 बजे तक दिया गया है।
कामिका एकादशी पारण कब करें?
कामिका एकादशी का व्रत 9 अगस्त को रखा जाएगा और इसका पारण 10 अगस्त को होगा। अल्मोड़ा के अनुसार पारण का समय सुबह 5रू36 बजे से 8रू00 बजे तक है। अन्य पंचांगों में भी पारण की अंतिम सीमा सुबह 8 बजे के आसपास दी गई है, जबकि शुरुआती समय स्थान के सूर्याेदय के अनुसार बदल रहा है। इसलिए अपने शहर के पंचांग के अनुसार समय देखना उचित रहेगा।
पारण के समय से पहले स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। भगवान विष्णु को तुलसी दल, पीले फूल, फल और भोग अर्पित करें। इसके बाद निर्धारित समय में जल ग्रहण करके व्रत खोलें।
पारण के लिए किन चीजों की जरूरत होगी?
कामिका एकादशी के पारण और भगवान विष्णु की पूजा के लिए बहुत ज्यादा सामग्री की जरूरत नहीं होती। श्रद्धा के अनुसार इन चीजों का इस्तेमाल किया जा सकता है-
भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर
तुलसी दल, पीले फूल, अक्षत, रोली या चंदन, धूप और दीपक, घी, फल, दूध, मिठाई या सात्विक भोग, गंगाजल, पंचामृत के लिए दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
पूजा में सबसे महत्वपूर्ण भगवान विष्णु का स्मरण और तुलसी अर्पित करना माना जाता है। सामग्री उपलब्ध न होने पर केवल जल, तुलसी और फल से भी पूजा की जा सकती है।
कामिका एकादशी पारण की संपूर्ण विधि
पारण वाले दिन सुबह सूर्याेदय से पहले या बाद में स्नान करें। इसके बाद घर के पूजा स्थान की सफाई करके भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाएं। भगवान विष्णु को गंगाजल अर्पित करें। इसके बाद चंदन, अक्षत, फूल और तुलसी दल चढ़ाएं।
भगवान विष्णु को फल और सात्विक भोग अर्पित करें। इसके बाद कामिका एकादशी की पूजा और व्रत के दौरान हुई भूल के लिए भगवान से क्षमा मांगें।
अब निर्धारित पारण काल में पहले जल ग्रहण करें। इसके बाद फल या हल्का सात्विक भोजन लेकर व्रत खोलें। अगर पूरे दिन निर्जल या कठिन उपवास किया है तो अचानक बहुत अधिक भोजन करने से बचें। पहले पानी, फल या हल्का भोजन लेना बेहतर रहेगा।
पारण के बाद सावन सोमवार का व्रत कैसे रखें?
10 अगस्त को एकादशी पारण के साथ ही सावन का दूसरा सोमवार भी है। ऐसे में जो लोग सावन सोमवार का व्रत रखते हैं, वे एकादशी पारण के बाद सोमवार की पूजा कर सकते हैं।
अगर सोमवार का व्रत फलाहारी रखा है तो पारण के बाद दिनभर फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बने सात्विक भोजन का सेवन किया जा सकता है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करें।
इस दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करना विशेष माना जाता है। शिवलिंग पर जल या गंगाजल चढ़ाएं। इसके बाद बेलपत्र, सफेद फूल और धतूरा अर्पित कर सकते हैं। ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें।
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शाम को सोम प्रदोष की भी करें पूजा
10 अगस्त को त्रयोदशी तिथि सुबह करीब 8 बजे शुरू होगी और 11 अगस्त की सुबह तक रहेगी। सोमवार के दिन त्रयोदशी पड़ने से यह सोम प्रदोष व्रत कहलाएगा। उत्तराखंड के क्लेमेंट टाउन क्षेत्र के पंचांग के अनुसार प्रदोष पूजा का समय शाम 7.04 बजे से रात 9.12 बजे तक है। स्थान के अनुसार इसमें कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
प्रदोष काल में भगवान शिव का जलाभिषेक करें। शिवजी को बेलपत्र, फूल और धतूरा अर्पित करें। दीपक जलाकर शिव चालीसा या शिव स्तुति का पाठ करें। इसके बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना भी शुभ माना जाता है।
एकादशी व्रत का पारण करने के बाद भोजन में संयम रखना चाहिए। बहुत अधिक तला-भुना या भारी भोजन करने से बचें। सावन सोमवार का व्रत रखने वाले लोग अपनी व्रत परंपरा के अनुसार फलाहार कर सकते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है, जबकि सावन सोमवार और सोम प्रदोष भगवान शिव की उपासना के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसलिए 10 अगस्त को सुबह भगवान विष्णु की पूजा और पारण करने के बाद सोमवार की पूजा तथा शाम को प्रदोष काल में शिव आराधना की जा सकती है।

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