देश भर में मनाया गया करवाचौथ, चांद का दीदार करने के बाद सुहागिनों ने निर्जला व्रत तोड़ा, पति की दीर्घायु की कामना

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समाचार सच, हल्द्वानी/देहरादून। देशभर में करोड़ों सुहागिन महिलाओं के रविवार सुबह से करवा चौथ त्योहार पर कठिन व्रत शुरू कर दिया है। सुहागिन महिलाओं का यह कठिन व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पूरा हुआ, करवा चौथ पर सुहागिन महिलाओं ने सुबह से ही पति की लंबी उम्र की कामना के साथ निर्जला व्रत रखा है। इस दौरान दिनभर खाना-पीना वर्जित होता है यह वजह है कि यह हिंदुओं के सबसे कठिन व्रत में शुमार है।

सुहागिन महिलाओं के लिए खास इस व्रत को सौभाग्य, सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं व्रत की कड़ी में पूजा में शिव परिवार और भगवान गणपति आराधना करती हैं, इसलिए करवा चौथ त्योहार पर पूजा का विशेष महत्व होता है। वास्तव में करवाचौथ का व्रत हिंदु संस्कृति के उस पवित्र बंधन का प्रतीक है, जो पति-पत्नी के बीच होता है। हिंदु संस्कृति में पति को परमेश्वर की संज्ञा दी गई है। करवाचौथ पति एवं पत्नी दोनों के लिए नवप्रणय निवेदन तथा एक-दूसरे के लिए अपार प्रेम, त्याग, एवं उत्सर्ग की चेतना लेकर आता है। इस दिन स्त्रियां पूर्ण सुहागिन का रूप धारण कर, वस्त्राभूषणों को पहनकर भगवान रजनीनाथ से अपने अखंड सुहाग की प्रार्थना करती हैं। स्त्रियां सुहागचिन्हों से युक्त शृंगार करके ईश्वर के समक्ष दिनभर के व्रत के उपरांत यह प्रण लेती हैं कि, वे मन, वचन एवं कर्म से पति के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखेंगी।

करवाचौथ हिंदुओं का एक प्रमख त्यौहार हैं। यह भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, और राजस्थान का पर्व हैं। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता हैं। करवाचौथ सौभाग्यवती, सुहागिन स्त्रियों के द्वारा मनाया जाता हैं। करवाचौथ का व्रत सुबह सर्वाेदय से पहले करीब 4-00 बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता हैं। ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी नारियां करवाचौथ का व्रत बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं। शास्त्रें के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के दिन करना चाहिए। पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिये इस दिन भालचंद्र गणेशजी की अर्चना की जाती हैं। करवाचौथ में भी संकष्टी गणेश चतुर्थी की तरह दिनभर उपवास रखकर रात में चंद्रमा को अर्ध्य देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान हैं।

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डॉ- आचार्य सुशांत राज का कहना हैं कि वर्तमान समय में करवाचौथ व्रतोस्व ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं। लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चंद्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करक चतुर्थी (करवाचौथ) व्रत करने का विधान हैं। इस व्रत की विशेषता यह हैं कि केवल सौभाग्यवती स्त्रियों को ही यह व्रत करने का अधिकार हैं। स्त्री किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो सबको इस व्रत को करने का अधिकार हैं। जो सौभाग्यवती सुहागिन स्त्रियां अपने पति की आयु, स्वास्थ्य एवं सौभाग्य की कामना करती हैं वह यह व्रत रखती हैं। यह व्रत 12 वर्ष तक अथवा 16 वर्ष तक लगातार हर वर्ष लगातार किया जाता हैं। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्ययाप किया जाता हैं। जो सुहागिन स्त्रियां आजीविन रखना चाहें वह जीवन भर इस व्रत को कर सकती हैं। इस व्रत के समान सौभाग्यदायक व्रत अन्य कोई दूसरा नहीं हैं। इसलिये सुहागिन स्त्रियां अपने सुहाग की रक्षार्थ इस व्रत का सतत पालन करती है।

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आज करवा चौथ के पावन अवसर पर सौभाग्यवती सुहागिन स्त्रियों ने करवों में लड्डू का नवैद्य रखकर नवैद्यय अर्पित किये। एक लोटा, एक वस्त्र एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित कर पूजन का समापन किया। इस अवसर पर करवाचौथ व्रत की कथा भी पढ़ी गयी। रात में चंद्रमा उदय होने पर छलनी की ओट में चंद्रमा का दर्शन करके अर्ध्य प्रदान किया गया। इसके पश्चात ब्राहमण, सुहागिन स्त्रियों व पतियों के माता पिता को भोजन कराया गया। भोजन के पश्चात पति की माता को उपरोक्त रूप से अर्पित एक लोटा, वस्त्र व विशेष करवा भेंट कर आर्शीवाद लिया गया। इसके पश्चात स्वंय व परिवार के अन्य सदस्यों को भोजन कराया गया।

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