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प्रकाशोत्सव की लख – लख बधाई, गुरु नानक देव जी की जीवनी

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गुरू नानक देव या नानक देव सिखों के प्रथम गुरू थे। गुरु नानक देवजी का प्रकाश (जन्म) 15 अप्रैल 1469 ई. में तलवंडी रायभोय नामक स्थान पर हुआ। सुविधा की दृष्टि से गुरु नानक का प्रकाश उत्सव कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है। तलवंडी अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। तलवंडी पाकिस्तान के लाहौर जिले से 30 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।

धार्मिक कट्टरता के वातावरण में उदित गुरु नानक ने धर्म को उदारता की एक नई परिभाषा दी। उन्होंने अपने सिध्दान्तों के प्रसार हेतु एक संन्यासी की तरह घर का त्याग कर दिया और लोगों को सत्य और प्रेम का पाठ पढ़ाना आरंभ कर दिया। उन्होंने जगह-जगह घूमकर तत्कालीन अंधविश्वासों, पाखन्डों आदि का जमकर विरोध किया।

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वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के भारी समर्थक थे। धार्मिक सदभाव की स्थापना के लिए उन्होंने सभी तीर्थों की यात्रायें की और सभी धर्मों के लोगों को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने हिन्दू धर्म और इस्लाम, दोनों की मूल एवं सर्वाेत्तम शिक्षाओं को सम्मिश्रित करके एक नए धर्म की स्थापना की जिसके मिलाधर थे प्रेम और समानता। यही बाद में सिख धर्म कहलाया। भारत में अपने ज्ञान की ज्योति जलाने के बाद उन्होंने मक्का मदीना की यात्रा की और वहां के निवासी भी उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। 25 वर्ष के भ्रमण के पश्चात् नानक कर्तारपुर में बस गये और वहीँ रहकर उपदेश देने लगे। उनकी वाणी आज भी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संगृहीत है।

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जिन-जिन स्थानों से गुरु नानक गुजरे थे वे आज तीर्थ स्थल का रूप ले चुके हैं। अंत में 1539 में ‘जपूजी’ का पाठ करते हुये उनका स्वर्ग प्रयाण हुआ।

विवाह
सन 1485 ई. में नानक का विवाह बटाला निवासी, मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ। उनके वैवाहिक जीवन के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी है। 28 वर्ष की अवस्था में उनके बड़े पुत्र श्रीचन्द का जन्म हुआ। 31 वर्ष की अवस्था में उनके द्वितीय पुत्र लक्ष्मीदास अथवा लक्ष्मीचन्द उत्पन्न हुए। गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु उनके सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए। घोड़े के व्यापार के निमित्त दिये हुए रुपयों को गुरु नानक ने साधुसेवा में लगा दिया और अपने पिताजी से कहा कि यही सच्चा व्यापार है। नवम्बर, सन् 1504 ई. में उनके बहनोई जयराम (उनकी बड़ी बहिन नानकी के पति) ने गुरु नानक को अपने पास सुल्तानपुर बुला लिया। नवम्बर, 1504 ई. से अक्टूबर 1507 ई. तक वे सुल्तानपुर में ही रहें अपने बहनोई जयराम के प्रयास से वे सुल्तानपुर के गवर्नर दौलत ख़ाँ के यहाँ मादी रख लिये गये। उन्होंने अपना कार्य अत्यन्त ईमानदारी से पूरा किया। वहाँ की जनता तथा वहाँ के शासक दौलत ख़ाँ नानक के कार्य से बहुत सन्तुष्ट हुए। वे अपनी आय का अधिकांश भाग ग़रीबों और साधुओं को दे देते थे। कभी-कभी वे पूरी रात परमात्मा के भजन में व्यतीत कर देते थे। मरदाना तलवण्डी से आकर यहीं गुरु नानक का सेवक बन गया था और अन्त तक उनके साथ रहा। गुरु नानक देव अपने पद गाते थे और मरदाना रवाब बजाता था। गुरु नानक नित्य प्रातरू बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे।

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आध्यात्मिक पुकार और निस्वार्थ सेवा
राय बुल्लर ने सबसे पहले गुरु नानक गुरू छंदंा की दिव्यता को समझा और उससे खुश होकर नानक को पाठशाला में रखा। नानक के गुरु उसकी आध्यात्मिक काव्य रचनाओ को सुनकर चकित रह गये। जब नानक को हिन्दू धर्म के पवित्र जनेऊ समारोह से गुजरने की बारी आयी तो उन्होंने उसमे भाग लेने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि उनका जनेऊ दया ,संतोष ,संयम से बंधा और सत्य का बुना होगा जो ना जल सकेगा, ना मिटटी में मिल सकेगा, ना खो पायेगा और ना कभी घिसेगा। नानक के इसके बाद जाति प्रथा का विरोध किया और मूर्ति पूजा में भाग लेने से भी मना कर दिया।

नानक देव के पिता कालू ने सोचा कि उनके पुत्र के आध्यात्मिक तरीके उसको लापरवाह बना रहे है तो उन्होंने नानक को व्यापार के धंधे में लगा दिया। नानक के व्यापारी बनकर कमाई के फायदे से भूखो को भोजन खिलाना शुरू कर दिया तभी से लंगर का इतिहास शुर हुआ था। इससे पहले जब पहली बार नानक को व्यापार के लिए उनके पिता ने भेजा तो उनको 20 रूपये देकर इन पैसो से फायदा कमाने को कहा। रास्ते में उनको साधुओ और गरीब लोगो का समूह मिला तो उन्होंने उन पैसो से उनके लिए भोजन और कपड़ो की व्यवस्था की। नानक जब घर खाली हाथ लौटे तो उनके पिता ने उनको सजा दी। पहली बार गुरू छंदंा गुरु नानक देव ने निस्वार्थ सेवा को असली लाभ बताया। इसी वजह से लंगर के मुलभुत सिधान्तो का उद्गम हुआ।

दस सिद्धांत
गुरूनानक देव जी ने अपने अनुघ्यायियों को जीवन के दस सिद्धांत दिए थे। यह सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है।

  1. ईश्वर एक है। 2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो। 3. जगत का कर्ता सब जगह और सब प्राणी मात्र में मौजूद है। 4. सर्वशक्तिमान ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता। 5. ईमानदारी से मेहनत करके उदरपूर्ति करना चाहिए। 6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएँ। 7. सदा प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने को क्षमाशीलता माँगना चाहिए। 8. मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके उसमें से जरूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए। 9. सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं। 10. भोजन शरीर को जिंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।
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प्रमुख गुरुद्वारा साहिब
गुरुद्वारा कंध साहिब- बटाला (गुरुदासपुर) – गुरु नानक का यहाँ पत्नी सुलक्षणा से 18 वर्ष की आयु में संवत् 1544 की 24वीं जेठ को विवाह हुआ था। यहाँ गुरु नानक की विवाह वर्षगाँठ पर प्रतिवर्ष उत्सव का आयोजन होता है।

गुरुद्वारा हाट साहिब

  • सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) गुरुनानक ने बहनोई जैराम के माध्यम से सुल्तानपुर के नवाब के यहाँ शाही भंडार के देखरेख की नौकरी प्रारंभ की। वे यहाँ पर मोदी बना दिए गए। नवाब युवा नानक से काफी प्रभावित थे। यहीं से नानक को ‘तेरा’ शब्द के माध्यम से अपनी मंजिल का आभास हुआ था।

गुरुद्वारा गुरु का बाग-
सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) यह गुरु नानकदेवजी का घर था, जहाँ उनके दो बेटों बाबा श्रीचंद और बाबा लक्ष्मीदास का जन्म हुआ था।

गुरुद्वारा कोठी साहिब-
सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) नवाब दौलतखान लोधी ने हिसाब-किताब में ग़ड़बड़ी की आशंका में नानकदेवजी को जेल भिजवा दिया। लेकिन जब नवाब को अपनी गलती का पता चला तो उन्होंने नानकदेवजी को छोड़ कर माफी ही नहीं माँगी, बल्कि प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन गुरु नानक ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

गुरुद्वारा बेर साहिब-
सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) जब एक बार गुरु नानक अपने सखा मर्दाना के साथ वैन नदी के किनारे बैठे थे तो अचानक उन्होंने नदी में डुबकी लगा दी और तीन दिनों तक लापता हो गए, जहाँ पर कि उन्होंने ईश्वर से साक्षात्कार किया। सभी लोग उन्हें डूबा हुआ समझ रहे थे, लेकिन वे वापस लौटे तो उन्होंने कहा- एक ओंकार सतिनाम। गुरु नानक ने वहाँ एक बेर का बीज बोया, जो आज बहुत बड़ा वृक्ष बन चुका है।

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