उत्तराखंड दौरे पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला—कैंची धाम में दर्शन, संवाद कार्यक्रम में सतत विकास और वन पंचायतों की भूमिका पर जोर

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समाचार सच, नैनीताल। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इन दिनों उत्तराखंड के दौरे पर हैं और अपने प्रवास के दौरान उन्होंने प्रशासनिक, सामाजिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की। बुधवार को उन्होंने नैनीताल स्थित डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया उत्तराखंड प्रशासनिक अकादमी में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने वन पंचायत प्रतिनिधियों, त्रिस्तरीय पंचायतों और शहरी निकायों के निर्वाचित सदस्यों से सीधा संवाद किया।

अपने दौरे के अगले चरण में लोकसभा अध्यक्ष ने प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कैंची धाम पहुंचकर पूजन-अर्चना की और नीब करौरी महाराज के दर्शन किए। इस आध्यात्मिक अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि हिमालय की गोद में बसे इस पावन धाम में उन्हें अद्भुत शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आत्मिक संतुलन का अनुभव हुआ। उन्होंने यहां के वातावरण, साधना-स्थली और भक्ति भाव को मन को गहराई से स्पर्श करने वाला बताया।

संवाद कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान ओम बिरला ने सतत विकास और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए सभी हितधारकों की सामूहिक भागीदारी को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों का सामना केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि जनसहभागिता और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाकर ही किया जा सकता है।

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उन्होंने उत्तराखंड की वन पंचायतों को सामुदायिक भागीदारी पर आधारित एक सफल मॉडल बताया। उनके अनुसार यह प्रणाली न केवल वन संरक्षण को मजबूती देती है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी गति प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि वन पंचायतें भारतीय लोकतंत्र की सबसे सशक्त कड़ियों में से एक हैं, जो जमीनी स्तर पर सुशासन और संरक्षण के कार्यों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा रही हैं।

ओम बिरला ने अपने संबोधन में जल, जंगल और जमीन के पारस्परिक संबंध को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ये तीनों प्राकृतिक संसाधन मानव जीवन और पर्यावरणीय संतुलन की आधारशिला हैं, जिनका संरक्षण केवल जरूरत नहीं बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इस दिशा में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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उन्होंने उत्तराखंड को प्रकृति और संस्कृति के सह-अस्तित्व का जीवंत उदाहरण बताते हुए यहां की परंपराओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि जल और वृक्षों के प्रति स्थानीय लोगों की आस्था सतत जीवनशैली का मार्गदर्शन करती है और यह पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है।

अपने संबोधन में उन्होंने औपनिवेशिक काल के दौरान वन संसाधनों के दोहन के खिलाफ स्थानीय समुदायों द्वारा किए गए संघर्षों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1930 के दशक से वन संरक्षण को लेकर कई नीतिगत प्रयास हुए हैं, लेकिन आज भी इनके प्रभावी क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां मौजूद हैं, जिनके समाधान पर ध्यान देना आवश्यक है।

ओम बिरला ने योग और आयुर्वेद की वैश्विक पहचान का जिक्र करते हुए वन पंचायतों के सहयोग से औषधीय पौधों के संरक्षण, मूल्य संवर्धन, शोध और आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के साथ उनके एकीकरण के लिए व्यापक कार्ययोजना बनाने की जरूरत बताई।

उन्होंने वनाग्नि जैसी गंभीर समस्याओं के समाधान में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को अत्यंत उपयोगी बताया। साथ ही जनभागीदारी बढ़ाने और पर्यावरण अनुकूल आजीविका के अवसर विकसित करने का आह्वान किया।

वन संरक्षण में महिलाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी भागीदारी न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि प्रेरणादायक भी है। संवाद कार्यक्रम के दौरान विभिन्न वन पंचायतों और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों ने वनाग्नि की रोकथाम, पंचायतों के सुदृढ़ीकरण, वित्तीय सहायता, तकनीकी सहयोग और अधिकारों के विस्तार से जुड़े मुद्दे उठाए। इस पर लोकसभा अध्यक्ष ने आश्वासन दिया कि उनके सुझावों और समस्याओं को केंद्र सरकार तक पहुंचाया जाएगा।

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